उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में शिकायत दर्ज; देश में ‘एक देश, एक शिक्षा’ और मुफ्त गुरुकुल पद्धति लागू करने की मांग।
नई दिल्ली।स्कूली शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण, निजी स्कूलों के एकाधिकार और अभिभावकों से हो रही अवैध वसूली के खिलाफ ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि संगठन’ ने एक बड़ा अभियान शुरू किया है। संगठन के संस्थापक अध्यक्ष सोहन गिरी ने देश के आम और मध्यमवर्गीय परिवारों को इस आर्थिक व मानसिक प्रताड़ना से बचाने के लिए प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, गृह मंत्री और शिक्षा मंत्री समेत सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों व राज्यपालों को एक मांग पत्र भेजा है। इस संबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में एक आधिकारिक शिकायत भी दर्ज कराई गई है।दबाव और मनमानी फीस से त्रस्त अभिभावकों की आवाज उठाते हुए संगठन के अध्यक्ष सोहन गिरी ने कहा, “जो शिक्षा कभी संस्कार देने और राष्ट्र निर्माण का सबसे पवित्र माध्यम हुआ करती थी, आज वह एक बड़े मुनाफे वाले धंधे में तब्दील हो चुकी है। निजी स्कूल मनमानी फीस, डोनेशन (कैपिटेशन फीस) और महंगी प्राइवेट किताबों के नाम पर अभिभावकों को खुलेआम लूट रहे हैं। सरकार इस तरह शिक्षा को बाजार में बिकते हुए मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकती। हमारा स्पष्ट मानना है कि स्कूल देश के निर्माता पैदा करेंगे, व्यापारी नहीं।”
संगठन की 5 प्रमुख मांगें:
1. अवैध वसूली पर कड़ा केंद्रीय कानून: डोनेशन, जबरन री-एडमिशन फीस और किताबों/यूनिफॉर्म पर कमीशनखोरी को संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) बनाया जाए और दोषी स्कूलों की मान्यता रद्द हो।
2. एक देश, एक शिक्षा: अमीर-गरीब की खाई पाटने के लिए पूरे देश के बच्चों के लिए एक समान पाठ्यक्रम और समान गुणवत्ता वाली शिक्षा लागू हो।
3. मुफ्त शिक्षा और आधुनिक गुरुकुल पद्धति: हर बच्चे को उच्च स्तर की शिक्षा मुफ्त मिले। प्राचीन गुरुकुल पद्धति को आधुनिक रूप में पुनर्जीवित किया जाए, ताकि बच्चों को तालीम के साथ संस्कार और हुनर भी मिल सके।
4. रोजगारपरक शिक्षा: बच्चे की प्राकृतिक प्रतिभा के आधार पर उसकी पढ़ाई की दिशा तय हो, जिससे भविष्य में उसे निश्चित रोजगार मिले।
5. नेशनल रेगुलेटरी कमीशन का गठन: जब तक पूरी तरह मुफ्त शिक्षा का लक्ष्य हासिल नहीं होता, तब तक प्राइवेट स्कूलों की फीस की सीमा (Cap) तय करने के लिए एक सख्त राष्ट्रीय नियामक आयोग बने।
संगठन ने वर्तमान केंद्र सरकार की सराहना करते हुए कहा है कि केवल मोदी सरकार ही देश में ‘एक देश, एक शिक्षा’ लागू करने और शिक्षा के इस व्यवसायीकरण को रोककर भारत के गौरवशाली इतिहास को पुनर्जीवित करने का सामर्थ्य रखती है। संगठन ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की है कि बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए सरकार जल्द से जल्द कड़े विधायी कदम उठाए।
