उत्तराखंड डेली न्यूज :ब्योरो

उत्तराखंड के चौखुटिया स्थित मालूधार गांव में जनवरी में ही अखरोट और नाशपती के पेड़ों पर फल लग गए हैं, जिससे स्थानीय लोग हैरान हैं। आमतौर पर ये फल गर्मियों में पकते हैं। बदलते मौसम चक्र, कम वर्षा और गर्म सर्दियों के कारण यह असामान्य घटना सामने आई है। यह वैश्विक पर्यावरणीय परिवर्तनों का एक स्थानीय उदाहरण है।बदलते मौसम चक्र के चलते पहाड़ में वर्षा व हिमपात का औसत कम होना एवं जलस्रोतों के सूखने जैसी स्थितियां बन रही हैं। पूस-माघ कड़ाके की ठंड के लिए जाने जाते हैं, लेकिन अब इस सर्द मौसम में भी बदलाव दिख रहा है। इसी का नतीजा है कि अब पेड़ों पर जून-जुलाई में तैयार होने वाला नाशपती फल जनवरी में और मई-जून में होने वाला अखरोट इन दिनों परिपक्व हो रहा है।बीते कुछ सालों से पूरे विश्व में पर्यावरणीय परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। कहीं अतिवृष्टि व कहीं खंडवृष्टि तो कहीं सूखे के हालात पैदा हो रहे हैं। इससे हिमालयी क्षेत्र उत्तराखंड भी अछूता नहीं है। कुछ वर्षों से यहां भी मौसम का रुख भी बदला-बदला नजर आ रहा है। गर्मी में वर्षा तो बरसाती सीजन में कम वर्षा का होना। इस बार सर्द मौसम में घाटी क्षेत्रों में दिन में गर्मी का एहसास होने से पेड़ों पर मार्च अप्रैल में लगने वाले बौर जनवरी में ही आने शुरू हो गए हैं। कहीं तो फल भी लगने लग गए हैं। प्रकृति के इस अजूबे से लोग हैरत में हैं।यहां गेवाड़ घाटी में भी कई वानस्पतिक परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। ब्लाक के दूरस्थ ग्राम पंचायत चुलेरासीम के मालूधार में प्रकृति ने अपना करिश्मा दिखाया है। यहां मई-जून में अंकुरित होने वाले अखरोट के पेड़ में फल लग गए हैं। एक नहीं कई पेड़ अखरोट से लदे हैं। पतझड़ होने के कारण टहनियों पर पत्तियां तो नहीं हैं, लेकिन अखरोट साफ दिखाई दे रहे हैं। वहीं राजेंद्र सिंह के नाशपती पेड़ में फल लगे हैं। जो ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बने हैं।
