उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो
कैग की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में नमामि गंगे कार्यक्रम के बावजूद गंगा देवप्रयाग के बाद आचमन योग्य नहीं है, केवल नहाने योग्य है।राष्ट्रीय नदी गंगा की स्वच्छता एवं निर्मलता के लिए चल रहे केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी नमामि गंगे कार्यक्रम के बावजूद उत्तराखंड में गंगा पूरी तरह साफ नहीं हो पाई है।भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की उत्तराखंड में नमामि गंगे कार्यक्रम के क्रियान्वयन पर केंद्रित वर्ष 2018 से 2023 की लेखा परीक्षा रिपोर्ट तो इसी तरह इशारा कर रही है, जो मंगलवार को विधानसभा के बजट सत्र में सदन के पटल पर रखी गई।रिपोर्ट बताती है कि देवप्रयाग तक गंगा का पानी आचमन योग्य (ए श्रेणी) है, जबकि इससे आगे ऋषिकेश व हरिद्वार तक यह नहाने योग्य (बी श्रेणी) ही है।कैग ने लेखा परीक्षा में इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन में कई खामियों को इंगित किया है तो राज्य गंगा मिशन की कार्यशैली के साथ ही उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर भी सवाल उठाए हैं।नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत प्रथम चरण में गंगा के उद्गम गोमुख से लेकर हरिद्वार तक के 16 शहरों को शामिल किया गया।इसके तहत गंगा में सीवेज और गंदे पानी को जाने से रोकने के दृष्टिगत इन शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के निर्माण व गंदे नालों की टैपिंग से संबंधित कार्य किए गए।कैग ने वर्ष 2018 से 2023 तक की अवधि तक की लेखा परीक्षा में गंगा में प्रदूषण को रोकने, नियंत्रित करने या कम करने के लिए इस कार्यक्रम की प्रभावशीलता का आकलन किया।इसमें 42 परियोजनाओं में 23 और पूर्व में बनाई गई परिसंपत्तियों के संचालन व अनुरक्षण को समाहित किया गया।
सीवेज विकास को राज्य क्षेत्र योजना में अनदेखी
रिपोर्ट में उल्लेख है कि राज्य सरकार ने गंगा तट पर स्थित नगरों में पूरक सीवेज सुविधाओं में वृद्धि को धन आवंटित ही नहीं किया।यद्यपि वर्ष 2018 से 2023 के दौरान राज्य क्षेत्र योजना के अंतर्गत स्वच्छता अवसरंचना तैयार करने को 55.08 करोड़ रुपये खर्च किए।इसमें गंगा से लगे 16 नगरों में नमामि गंगे की निधि से बने एसटीपी के साथ घरों को जोड़ने को कोई निधि नहीं दी गई। सात नगरों में तो एक भी घर एसटीपी से नहीं जुड़ा था।ये बात भी सामने आई कि ये एसटीपी सीवेज के बजाय केवल धूसर पानी का ही शोधन कर रहे थे।
ऋषिकेश में कोरोनाकाल में पीने योग्य रहा गंगा जल
लेखा परीक्षा में कैग ने पाया कि देवप्रयाग तक गंगा के जल की गुणवत्ता ए श्रेणी में रही। कोरोनाकाल में (वर्ष 2020 व 2021) में ऋषिकेश में गंगा जल में ए श्रेणी तक सुधार हुआ, जो फिर से बी श्रेणी में आ गई।अलबत्ता, हरिद्वार में लेखा परीक्षा की अवधि में गंगा जल की गुणवत्ता बी श्रेणी में ही बनी रही। यही नहीं, देवप्रयाग से हरिद्वार तक 93 किलोमीटर की दूरी के बीच अक्टूबर 2023 में कालीफार्म का स्तर 32 गुना बढ़ा हुआ पाया गया।पीसीबी की प्रयोगशालाएं गैर मान्यता प्राप्त,रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) की देहरादून, रुड़की व काशीपुर में संचालित प्रयोगशालाओं के लिए ष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने जून 2018 में 16.21 करोड़ रुपये की परियोजना मंजूरी की थी।पांच वर्ष की इसके तहत तीनों प्रयोगशालाओं को एनएबीएल से मान्यता प्राप्त करने की जरूरत थी, ताकि परीक्षण और मापांकन रिपोर्ट में सटीकता व विश्वसनीयता रहे।बावजूद इसके छह वर्ष बाद भी यह मान्यता नहीं ली गई। लेखा परीक्षा में पीसीबी और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की प्रयोगशाला के परिणाम के बीच अंतर देखा गया।यह अंतर हरिद्वार के जगजीतपुर एसटीपी के परीक्षण परिणाम से सामने आया। इसी तरह की विसंगति अन्य एसटीपी के परीक्षण में भी देखी गई।
पांच साल में सरेंडर किए 21.34 करोड़
नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत वर्ष 2018-19 से 2022-23 तक 985.17 करोड़ रुपये की धनराशि उपलब्ध कराई गई, जिसमें से 873.17 करोड़ रुपये ही उपयोग में लाए गए। शेष 21.34 करोड़ रुपये की राशि राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को वापस की गई।
यह सामने आई खामियां
एसटीपी के सीवेज शोधन की गुणवत्ता बेहद खराब
एनजीटी के मानदंडों का नहीं किया गया अनुपालन
मौजूदा एसटीपी में पर्याप्त शोधन क्षमता का अभाव।
18 एसटीपी के निर्माण और प्रचालन में कमियों के चलते जल संस्थान ने इन्हें नियंत्रण में लेने से किया इन्कार। राज्य गंगा समिति ने एसटीपी का नहीं कराया सुरक्षा आडिट, जिससे जान-माल की क्षति हुई।
राज्य स्वच्छ गंगा मिशन द्वारा निर्मित श्मशान घाट में ज्यादातर रहे अनुपयोगी।
नियोजित व्यय का 16 प्रतिशत ही क्रियान्वित किए जाने वे वन संबंधी गतिविधियों की प्रगति रही अत्यंत सीमित।
नदी की ढलानों पर फेंका गया अथवा जलाया गया अपशिष्ट फिर बहकर नदी में आ रहा था वापस।
यह दिए गए हैं सुझाव
सीवेज शोधन संयत्रों का व्यापक सुरक्षा आडिट कराया जाए।
संयत्रों को हस्तांतरण से पहले कमियों को दूर कराया जाए।
घरों को एसटीपी से जोड़ने को बने पर्याप्त घरेलू सीवेज नेटवर्क।
गंगा के तटवर्ती नगरों में पर्याप्त सह-शोधन सुविधाओं की बने योजना।
अशोधित सीवेज नदी में गिरने पर तय की जाए जिम्मेदारी।
स्थानीय निकायों में अपशिष्ट का दक्षतापूर्ण प्रसंस्करण व निपटान हो।
पीसीबी अपनी सभी प्रयोगशालाओं के लिए अंशशोधन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड से मान्यता प्राप्त करे।
आनलाइन सतत प्रवाह अनुश्रवण प्रणाली से खामियों को कराएं दूर।
