उत्तराखंड डेली न्यूज :ब्योरो

देहरादून के शीशमबाड़ा प्लांट की दुर्गंध और दूषित पानी से स्थानीय निवासी गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं, जिससे छात्रों की पढ़ाई और आसन नदी के पर्यावरण पर भी बेहद बुरा असर पड़ रहा है।देहरादून से 35 किमी दूर शीशमबाड़ा में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट के करीब दस किमी के दायरे में रहने वाली दो लाख की आबादी परेशान है। प्लांट से उठने वाली दुर्गंध यहां के बाशिंदों के लिए नासूर बन चुकी है। ‘हिंदुस्तान’ समाचार पत्र ने ग्राउंड जीरो पर जाकर इस मामले की पड़ताल करते हुए लोगों की परेशानी जानी।लोग हो रहे बीमार,प्लांट से लगती सेलाकुई की गोरखा बस्ती के रोशन लाल के घर पर बुधवार दोपहर कई लोग बात कर रहे हैं। ये लोग हैं 2005 से 2014 के बीच यहां बसे थे। इनको 2016 के मध्य तक पता नहीं था कि यहां देहरादून और राज्य के अन्य हिस्सों की गंदगी का पहाड़ बनने वाला है। गले में खराश, सिर में भारीपन, सांस लेने में परेशानी और खाना खाने के बाद जी मिचलाना सबकी शिकायत है। कुछ डिप्रेशन के शिकार हैं। कहते हैं कि सारी पूंजी यहां लगा दी अब दूसरी जगह जाने की स्थिति में नहीं हैं। किसान नरगिस कश्यप प्लांट के विरोध में कई बार आंदोलन कर चुके हैं।
कई बार हो चुका है विरोध
बताते हैं कि अप्रैल 2017 में तत्कालीन मेयर ने शिलान्यास किया तो विरोध हुआ। जनवरी 2018 को सीएम ने प्लांट की मशीनों का उद्घाटन किया तो भी विरोध हुआ। प्रशासन ने बताया कि यह ‘फुली कवर्ड एंड मैकेनाइज्ड विंडो एरोबिक सिस्टम’ है। मशीनें चालू हो जाएंगी तो बदबू नहीं आएगी। राज गंगसारी कहते हैं कूड़े की गाड़ियों को प्लांट में जाने से रोका तो 40 फुट ऊंची चहारदीवारी के साथ कूड़े को कवर करने व एंजाइम के छिड़काव पर सहमति बनी। चहारदीवारी 25 फुट ही है। एंजाइम का छिड़काव किया गया। इससे कूड़े की बदबू तो कुछ समय खत्म हो जाती थी लेकिन घुटन फैल जाती थी। ममता नेगी कहती हैं कि बच्चे बीमार पड़ रहे हैं। एक अन्य महिला बताती हैं कि कूड़े के ढेर से चील-कौवे मांस के लोथड़े लाकर घर और छतों पर गिरा देते हैं। वह कहती हैं कि हाल में दो लोगों को कैंसर हो चुका है। इसके बाद ‘हिंदुस्तान’ संवाददाता प्लांट देखने गए। प्लांट से सटे गेहूं के खेतों को पानी दे रहे किसान मोहन सैनी कहते हैं कि सिंचाई के लिए बोरिंग की है। पानी चार फुट पर है लेकिन गंदा होने से 20 फुट बोरिंग की है। 20 फुट का पानी भी पीने लायक नहीं है। उनके अनुसार इस पानी को पीने से दो कुत्ते हाल में मर गए। इस पानी को पीने से पक्षी तक मर रहे हैं।
इलाके में पेट से जुड़ी बीमारियों के मरीज बढ़े
स्थानीय निवासी संजय सहगल का कहना है कि क्षेत्र में लोग अक्सर बीमार रहते हैं। बच्चों के स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। कई लोग गंभीर बीमारी से ग्रसित है। बदबू के कारण घर के दरवाजे और खिड़कियां हमेशा बंद रखी जाती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सेलाकुई की प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. उमा ने बताया कि गंदा पानी पीने से पेट संबधी बीमारी के 70 से 80 मरीज हर दिन अस्पताल आते हैं। उन्होंने पानी उबालकर पीने की सलाह दी है।
दुर्गंध के बीच करनी पड़ती है पढ़ाई
प्लांट के सामने वाले हिस्से में जहां जिज्ञासा यूनिवर्सिटी के गेट पर छात्र प्रदीप शाही, कनकलता, सौरभ सक्सेना, विनीत कुमार मिलते हैं। चारों दूसरे प्रांतों से यहां उच्च शिक्षा लेने आए हैं, जिन्होंने कहा कि यदि उन्हें पहले पता होता कि इस बदबू में पढ़ाई करनी पड़ेगी तो किसी भी हालत में यहां एडमिशन न लेते। कनकलता कहती हैं, क्लास रूम के दरवाजे बंद करने के बाद भी बदबू आती है।शिक्षण संस्थान के निकट प्लांट को कैसे अनुमति मिली,हालांकि गेट से मुख्य भवन की दूरी पांच सौ मीटर से अधिक है। दो प्राध्यापकों से भी गेट पर ही मुलाकात होती है। वो अपनी पहचान नहीं बताते हैं, लेकिन सवाल करते हैं कि यहां कई साल से यूनिवर्सिटी और अन्य शिक्षण संस्थान हैं, बावजूद इसके कुछ मीटर की दूरी पर वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट को कैसे अनुमति मिल गई?
दूषित पानी और अन्य गंदगी आसन नदी में जा रही
प्लांट से निकलने वाला दूषित पानी और अन्य गंदगी आसन नदी में जा रही है। आसन नदी को पछुवादून की जीवनदायिनी कहा जाता है। यहां की करीब 60 प्रतिशत आबादी पेयजल के लिए इसी नदी पर निर्भर है। जाहिर है दूषित पानी पीने से लोग बीमार हो रहे हैं। यही दूषित पानी आसन बैराज झील में भी जाता है जिससे झील के प्रवासी परिंदों के जीवन पर भी खतरा मंडरा रहा है। चकराता वन प्रभाग के पक्षी विशेषज्ञ प्रदीप सक्सेना का कहना है कि दूषित पानी से कई परिंदे बीमार हो रहे हैं। इससे यहां आने वाले परिंदों की संख्या में कमी आ रही है।
