उत्तराखंड डेली न्यूज :ब्योरो
भारत में करीब 45 हजार प्रजाति के पौधे पाए जाते है, जिनमें लगभग 15 हजार औषधीय माने जाते है। आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, प्राकृतिक चिकित्सा और होम्योपैथी जैसी परंपरागत पद्धतियां इन्ही पर आधारित है।मुंबई जैसे तेज रफ्तार शहर में जहां कंक्रीट का जंगल बढ़ता जा रहा है, वही असली जंगल सिमटते जा रहे है। लेकिन इस भागदौड़ के बीच कुछ लोग ऐसे भी है जो पेड़ों और जड़ी-बूटियों को बचाने की जिद पर अड़े है। गोरेगांव के करीब 3 हजार एकड़ में फैले आरे जंगल में रहने वाली वनीता ठाकरे के लिए यह जंगल सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि उनकी दवा की दुकान है।वनीता के घर में अगर कोई बीमार पड़ जाए तो वे मेडिकल स्टोर नही जाती। वे सीधे जंगल का रुख करती है। उनके घर में हमेशा सफेद, नीली और पीली हल्दी मौजूद रहती है। वनीता बताती है कि नीली हल्दी अस्थमा में काम आती है, सफेद हल्दी जोड़ों के दर्द में राहत देती है और पीली हल्दी एंटीसेप्टिक की तरह इस्तेमाल होती है। बचपन से सीखी पारंपरिक जानकारी के आधार पर वे जड़ों, पत्तों और तनों से लेप और काढ़ा तैयार करती है।भारत में 15 हजार औषधीय पौधे,3 मार्च को विश्व वन्यजीव दिवस मनाया जाता है। इस दिन सिर्फ जानवरों की ही नही, बल्कि औषधीय और खुशबूदार पौधों की अहमियत पर भी बात होती है। भारत में करीब 45 हजार प्रजाति के पौधे पाए जाते है, जिनमें लगभग 15 हजार औषधीय माने जाते है। आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, प्राकृतिक चिकित्सा और होम्योपैथी जैसी परंपरागत पद्धतियां इन्ही पर आधारित है। 2023 के एक सर्वे के मुताबिक, गांवों में 46% और शहरों में 53% लोग किसी न किसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का इस्तेमाल करते है। लेकिन चिंता की बात यह है कि ऐसे पौधे तेजी से कम हो रहे हैं।पेड़ों और जड़ी- बूटियों को बचाने के मिशन पर है नेचर लवर्स फॉरेजिंग वॉक, पारंपरिक खाना बनाने के कार्यक्रम और पौधारोपण जैसे आयोजन का ले रहे सहारा,भारत में करीब 45 हजार प्रजाति के पाए जाते है पौधे मुश्किल में दिख रहे कई औषधीय पौधे,नेचर एक्सपर्ट विजया चक्रवर्ती बताती है कि मुंबई और आसपास पहले सफेद मूसली, गिलोय और मुरुड शेग जैसे कई औषधीय पौधे आसानी से मिल जाते थे, जो अब मुश्किल से दिखते है। इसी चिंता को लेकर वनीता और वाघोबा हैबिटेट फाउंडेशन के संस्थापक संजीव वल्सन लोगों को जंगल से जोड़ने में जुटे है। वे फॉरेजिंग वॉक (Foraging Walk), पारंपरिक खाना बनाने के कार्यक्रम और पौधारोपण जैसे आयोजन करते है।फॉरेजिंग वॉक में वह बताते है कि कौन सा पौधा खाने लायक है और कौन सा दवा को तौर पर काम में आता है।उनका मानना है कि जब शहर के लोग जंगल को समझेंगे, तभी वे उसके संरक्षण के लिए आगे आएंगे। इससे आदिवासी समुदाय को रोजगार भी मिलता है।हालांकि एक्सपर्ट विनिता गौड़ा चेतावनी देती है कि हर पौधा सही मात्रा में दवा हो सकता है, लेकिन ज्यादा मात्रा में वही नुकसान भी पहुंचा सकता है। इसलिए समझदारी जरूरी है।2018 तक मुंबई खो चुकी 77% ग्रीन एरिया,2018 तक मुंबई अपना 77% ग्रीन एरिया खो चुकी थी। हरियाली घटने के साथ लोग बचे हुए पौधों को भी नजरअंदाज करने लगते है, जिसे ‘प्लांट ब्लाइंडनेस’ कहा जाता है। इस सोच को बदलने के लिए कलाकार अभिषेक खान ‘थिएटर ऑफ बॉटनी’ के जरिए अनोखी वॉक करवाते है। इसके जरिए लोगों को पेड़ों से जुड़ी कहानियां सुनाते है। उनका मानना है कि पेड़ों को जिंदा रहने के लिए सिर्फ मिट्टी नही, बल्कि लोगों का जुड़ाव और कल्पना भी जरूरी है।
