उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो

अगर आप पहाड़ों में घूमने आएं और यहां की पारंपरिक ‘लाल चावल की खीर’ नहीं खाई, तो समझिये आपने असली स्वाद चखा ही नहीं. यह केवल एक मीठा व्यंजन नहीं, बल्कि पहाड़ी सेहत और संस्कृति का अनमोल हिस्सा है. पीतल के बर्तन में धीमी आंच पर पकने वाली यह खीर जब अपना रंग बदलती है, तो इसकी खुशबू पूरे घर में महक उठती है. जानिए बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए फायदेमंद माने जाने वाली इस खीर को बनाने की खास विधि और सही तरीका.पहाड़ों की रसोई में बनने वाली लाल चावल की खीर सिर्फ एक स्वीट डिश नहीं है, बल्कि यह सेहत, स्वाद और परंपरा का मेल है. यह खीर आम सफेद चावल की खीर से बिल्कुल अलग होती है, क्योंकि इसे खास पहाड़ी लाल चावल से बनाया जाता है. पहाड़ों में आज भी इसे पीतल के ‘तोले या तौली’ (एक तरह का बड़ा बर्तन) में बनाया जाता है, जिससे इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है. गांवों में बुजुर्गों का मानना है कि लाल चावल शरीर को जबरदस्त ताकत देते हैं, इसलिए यह खीर बच्चों, बुजुर्गों और यहां तक कि बीमार व्यक्ति के लिए भी बहुत फायदेमंद मानी जाती है. पूजा-पाठ हो, त्योहार हो या कोई खास मेहमान घर आया हो, लाल चावल की खीर बनाना बहुत शुभ माना जाता है.दूध के साथ पककर बदल जाता है रंग,जब लाल चावल दूध में पकते हैं, तो धीरे-धीरे अपनी खुशबू और रंग छोड़ने लगते हैं. शुरुआत में ये चावल गहरे लाल रंग के होते हैं, लेकिन जैसे-जैसे ये दूध में पककर गलते हैं, इनका रंग हल्का सफेद या गुलाबी होने लगता है. यही बदलाव इस खीर को एक अनोखा रंग और सोंधा स्वाद देता है. यह खीर न तो बहुत ज्यादा मीठी होती है और न ही पेट पर भारी पड़ती है, इसे खाने के बाद शरीर में हल्कापन और ताजगी महसूस होती है.पहाड़ी खीर बनाने की आसान विधि,पहाड़ी खीर बनाने का तरीका बहुत ही सरल है, आइए जानते हैं इसे बनाने की पूरी विधि.
