उत्तराखंड डेली न्यूज़ :ब्योरो

उत्तराखंड रैबार” केवल एक शब्द नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा, हमारी मातृभाषा और सामाजिक संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। हाल ही में अजीत डोभाल जी द्वारा गढ़वाली भाषा के सुंदर और सशक्त शब्दों में दिए गए एक भाषण को सुनकर और उस पर गहन चिंतन करने के बाद ये शब्द मेरे मन से निकले हैं। रैबार वह परंपरा थी, जिसके माध्यम से गांव-गांव, घर-घर सच्चाई, संवेदना और आपसी भरोसे का संदेश पहुँचाया जाता था। यही कारण है कि डोभाल जी द्वारा रैबार शब्द का प्रयोग उत्तराखंड की उस संस्कृति को सम्मान देना है, जहाँ संवाद केवल बात कहना नहीं, बल्कि रिश्ते निभाने का माध्यम होता था।आज नई पीढ़ी की दुनिया सिमटकर केवल सोशल मीडिया तक रह गई है, और उसी के साथ रैबार जैसे शब्द हमारी मातृभाषा और लोकजीवन से धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि अब गांवों में भी लोग आपस में तालमेल नहीं रख पा रहे हैं। जो व्यक्ति मेल-मिलाप या संवाद की पहल करता है, उसकी बात को तोड़-मरोड़ कर आगे इस तरह पहुँचाया जाता है कि वह स्वयं शर्मिंदा हो जाता है—कि उसने कहा क्या था और दिखाया क्या जा रहा है।यही गलत संप्रेषण, अविश्वास और अहंकार हमारी लोकसंस्कृति को भीतर से खोखला कर रहा है। यह केवल रिश्तों के टूटने का नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा के क्षरण का संकेत है। आज आवश्यकता है कि हम फिर से रैबार की भावना को जीवित करें—साफ संवाद, आपसी सम्मान और सामूहिक जिम्मेदारी के साथ—ताकि हमारी संस्कृति डूबे नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और जीवंत बनी रहे।
