उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो

बसंत ऋतु का आगमन प्रकृति में नई ऊर्जा और रंग लेकर आता है, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार यह समय स्वास्थ्य के लिए थोड़ा जरूरी हैबसंत ऋतु का आगमन प्रकृति में नई ऊर्जा और रंग लेकर आता है, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार यह समय स्वास्थ्य के लिए थोड़ा संवेदनशील भी होता है. दिन में बढ़ती गर्मी और रातों में हल्की ठंडक शरीर में ‘कफ दोष’ को सक्रिय कर देती है. अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि बसंत की रातों में उन्हें पेट भारी होना, अपच या नींद में बाधा महसूस होती है.आयुर्वेद के मुताबिक, सर्दियों के दौरान शरीर में जमा हुआ कफ सूरज की बढ़ती गर्मी से पिघलने लगता है. अगर रात में भारी, ठंडा या गरिष्ठ भोजन किया जाए, तो यह कफ और बढ़ जाता है और जुकाम, खांसी, पेट की समस्या और मेटाबॉलिज्म सुस्त होने जैसी परेशानियां पैदा होती हैं. इसलिए बसंत में हल्का और सुपाच्य भोजन करना बेहद जरूरी है.
मूंग दाल की खिचड़ी सबसे अच्छा ऑप्शन
रात के भोजन के लिए मूंग दाल की खिचड़ी सबसे अच्छा विकल्प है। यह हल्की और सुपाच्य होती है और पेट पर दबाव नहीं डालती. इसमें थोड़ी सोंठ पाउडर डालने से इसका गुण और बढ़ जाता है। भुनी हुई मौसमी सब्जियां जैसे लौकी, तोरई और परवल भी फाइबर से भरपूर होती हैं और कब्ज जैसी समस्या से बचाती हैं. बाजरे की रोटी शरीर की नमी और कफ को सोखने में मदद करती है, इसलिए इसे सीमित मात्रा में रात के भोजन में शामिल करना फायदेमंद है.
श्वसन तंत्र को साफ रखने का तरीका
इसके अलावा अदरक और शहद का गुनगुना पानी पीना बसंत की रातों में श्वसन तंत्र को साफ रखने और कफ को पिघलाने का परंपरागत तरीका है। मेथी का साग या पराठा भी इस समय विशेष लाभकारी है, क्योंकि यह बढ़े हुए कफ को कम करता है और डायबिटीज या जोड़ों के दर्द वाले लोगों के लिए मददगार है. अगर आप दूध पीते हैं, तो बसंत में हल्दी वाला गुनगुना दूध ही लें, यह एलर्जी और सूजन से बचाता है.जौ का सूप, सहजन की फली, पपीता और सोंठ-अजवाइन का तड़का भी रात के भोजन में शामिल किए जा सकते हैं. ये हल्के, सुपाच्य और कफ नाशक गुणों से भरपूर होते हैं. बसंत में खाने के कुछ गोल्डन रूल्स भी हैं. खाना जल्दी खाएं, रात 8 बजे तक खाना पूरा कर लें, ठंडे पानी से बचें और दही का सेवन न करें.
