उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने गैंग रेप के एक मामले में दो आरोपियों की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है। जस्टिस रविंद्र मैठाणी और जस्टिस आशीष नैथानी की खंडपीठ ने 12 फरवरी को सुनाए अपने फैसले में हालांकि, अपहरण के मामले में एक आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा।उत्तराखंड हाई कोर्ट ने गैंग रेप के एक मामले में दो आरोपियों की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है। जस्टिस रविंद्र मैठाणी और जस्टिस आशीष नैथानी की खंडपीठ ने 12 फरवरी को सुनाए अपने फैसले में हालांकि, अपहरण के मामले में एक आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। आरोपियों ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में 2018 में हुई घटना के संबंध में निचली अदालत के 2019 के निर्णय को चुनौती देते हुए अपीलें दायर की थीं। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मानसिक रूप से कमजोर एक महिला लापता हो गई थी और बाद में वह डरी हुई हालत में मिली थी। जांच के दौरान मामले में चिकित्सकीय और फॉरेंसिक टेस्ट हुए।सीसीटीवी फुटेज और डीएनए रिपोर्ट समेत मेडिकल, फॉरेंसिक और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की जांच करने पर हाई कोर्ट ने पाया कि मेडिकल राय में निर्णायक रूप से रेप साबित नहीं हुआ और फॉरेंसिक जांच में चूक हुई। इसलिए यौन उत्पीड़न के आरोपों को साबित नहीं किया जा सकता।अदालत ने पाया कि फॉरेंसिक सामग्री दोनों आरोपियों को कथित यौन उत्पीड़न से नहीं जोड़ती, फिर भी सीसीटीवी फुटेज और आस-पास की परिस्थितियों से यह साबित होता है कि सह-आरोपी पीड़िता को कानूनी संरक्षकता से दूर ले गया था। इसलिए दोनों आरोपियों की दुष्कर्म से संबंधित दोषसिद्धि को रद्द करते हुए, अदालत ने उनमें से एक आरोपी की अपहरण की दोषसिद्धि को बरकरार रखा।इस मामले में आरोपी पहले ही चार साल से अधिक की कैद काट चुका है, जो इस मामले में दी गयी सजा के बराबर है, अदालत ने दोनों की रिहाई के आदेश दिए। हाई कोर्ट ने संदेह के आधार की बजाय कानूनी तौर पर सिद्ध सबूतों के आधार पर आपराधिक दोषसिद्धि किए जाने पर बल देते हुए फैसले में कहा कि अदालतों को ‘कमजोर पीड़ितों’ से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता दिखानी चाहिए, फिर भी संदेह से परे सबूत का मानक आवश्यक है।
