उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए CPC के आदेश 41 नियम 33 का हवाला देकर मोटर दुर्घटना मुआवज़ा बढ़ाया जा सकता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अपीलीय अदालत ऐसी शक्ति का प्रयोग तब कर सकती है, जब अवार्ड को न्यायसंगत और पूर्ण बनाना आवश्यक हो।जस्टिस रविंद्र मैथानी ICICI लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी द्वारा दायर अपील की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (Motor Accident Claims Tribunal) द्वारा 16.12.2022 को पारित अवार्ड को चुनौती दी गई। इस अवार्ड के तहत, दावाकर्ता को 28,26,645 रुपये का मुआवज़ा दिया गया। यह दावा 19.10.2015 को हुई एक दुर्घटना से संबंधित था, जिसमें दावाकर्ता को चोटें आईं थीं, जिसके परिणामस्वरूप उसे मानसिक विकलांगता हो गई।अधिकरण ने यह माना था कि यद्यपि दावाकर्ता को 50% दिव्यांगता हुई, लेकिन उसकी कमाई की क्षमता में 100% की कमी आई थी, और तदनुसार मुआवज़ा दिया। बीमाकर्ता ने दिव्यांगता, आय और विभिन्न मदों के तहत दी गई राशि से संबंधित निष्कर्षों को चुनौती दी थी। दूसरी ओर, दावाकर्ता ने इस आधार पर मुआवज़ा बढ़ाने की मांग की कि भविष्य की संभावनाओं (Future Prospects) पर विचार नहीं किया गया।कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की जांच की और लापरवाही, दिव्यांगता तथा कमाई की क्षमता में कमी से संबंधित अधिकरण के निष्कर्षों को सही ठहराया। कोर्ट ने यह पाया कि दावाकर्ता मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गया और कोई भी काम करने में असमर्थ था। इसलिए कमाई की क्षमता में 100% की कमी के निष्कर्ष में किसी भी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी। कोर्ट ने परिचारक शुल्क (Attendant Charges), भविष्य के इलाज और अन्य मदों के लिए दी गई राशि को भी सही ठहराया। साथ ही यह माना कि इस तरह के आकलन में अनुमान शामिल होता है और इसे अत्यधिक नहीं कहा जा सकता।इसके बाद कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि क्या दावाकर्ता द्वारा क्रॉस-अपील दायर न किए जाने की स्थिति में भी मुआवज़ा बढ़ाया जा सकता है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का संदर्भ दिया और टिप्पणी की कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए CPC के आदेश 41 नियम 33 के तहत प्राप्त शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है। कोर्ट ने यह पाया कि अधिकरण द्वारा भविष्य की संभावनाओं पर विचार नहीं किया गया, जबकि दावाकर्ता 32 वर्ष का था और प्रति माह 11,000 रुपये कमा रहा था।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“…माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए संहिता के आदेश 41 नियम 33 के प्रावधानों को लागू किया जा सकता है।”कोर्ट ने फैसला दिया कि भविष्य की संभावनाओं के लिए 40% की अतिरिक्त राशि जोड़ी जानी आवश्यक थी। मुआवज़े के सभी मदों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कुल मुआवज़े की राशि की फिर से गणना की, जो 36,71,445/- रुपये थी; जैसा कि फैसले में दी गई तालिका में दर्शाया गया।तदनुसार, बीमाकर्ता द्वारा दायर अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने मुआवज़े की राशि को 28,26,645/- रुपये से बढ़ाकर 36,71,445/- रुपये किया और अपीलकर्ता को निर्देश दिया कि वह दावा याचिका दायर करने की तारीख से लेकर वास्तविक भुगतान की तारीख तक, 9% प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित यह बढ़ी हुई राशि का भुगतान करे।
