
उत्तराखंड डेली न्यूज :ब्योरो
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कथित कॉपीराइट स्ट्राइक के कारण हटाए गए यूट्यूब चैनल को बहाल कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दाखिल नहीं की जा सकती।अदालत ने कहा कि किसी यूट्यूबर और सोशल मीडिया मंच के बीच उत्पन्न संविदात्मक विवाद के समाधान के लिए रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग नहीं किया जा सकता।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी की एकल पीठ ने यह फैसला एक यूट्यूबर की याचिका पर सुनाया जिसमें उसने अपने यूट्यूब चैनल को पहले की स्थिति में बहाल करने, हटाई गई सभी सामग्री वापस उपलब्ध कराने और उसके खिलाफ दर्ज सभी कॉपीराइट स्ट्राइक हटाने का निर्देश देने की मांग की थी।याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसके यूट्यूब चैनल को कथित तीन कॉपीराइट स्ट्राइक के आधार पर बिना कोई नोटिस दिए और बिना सुनवाई का अवसर प्रदान किए हटा दिया गया।हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता और यूट्यूब के बीच सेवा की शर्तों के आधार पर एक अनुबंध मौजूद है। यदि यूट्यूब को यह लगता है कि उन शर्तों का उल्लंघन हुआ है, तो वह अनुबंध के अनुसार कार्रवाई कर सकता है।
अदालत ने कहा,
“मांगी गई राहत रिट याचिका में नहीं दी जा सकती। यह निर्विवाद है कि याचिकाकर्ता ने यूट्यूब के साथ कुछ नियम और शर्तों के आधार पर समझौता किया था। यदि यूट्यूब को लगता है कि उन शर्तों का उल्लंघन हुआ है, तो वह याचिकाकर्ता का खाता हटा सकता है।”पीठ ने आगे कहा कि यह स्थापित विधिक सिद्धांत है कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उपलब्ध सार्वजनिक विधि का उपचार संविदात्मक विवादों या अनुबंध से उत्पन्न दावों के निपटारे के लिए नहीं अपनाया जा सकता।सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दावा किया कि उनकी मुवक्किल ने यूट्यूब के साथ हुए समझौते की किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया है।वहीं प्रतिवादी पक्ष ने तर्क दिया कि यूट्यूब संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत राज्य की परिभाषा में नहीं आता इसलिए उसके खिलाफ रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।इन तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत सार्वजनिक विधि का उपचार इस प्रकार के संविदात्मक विवाद के समाधान का उपयुक्त माध्यम नहीं है।हालांकि, अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपयुक्त वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता प्रदान की।
