उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो
दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई–एनआरएलएम) के अंतर्गत संचालित ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (आरएसईटीआई) हैं, जो ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने तथा सूक्ष्म उद्यमों को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। जिला स्तर पर स्थापित ये संस्थान 18 से 50 वर्ष आयु वर्ग के बेरोजगार ग्रामीण युवाओं को निःशुल्क, अल्पकालिक, व्यावहारिक एवं आवासीय प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। इनका उद्देश्य केवल कौशल विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशिक्षुओं को आत्मनिर्भर उद्यमी बनने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन और संसाधन भी उपलब्ध कराना है।ग्रामीण विकास मंत्रालय, राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों तथा प्रायोजक बैंकों के बीच त्रिपक्षीय साझेदारी के आधार पर संचालित यह पहल प्रशिक्षण के बाद भी प्रतिभागियों से जुड़ी रहती हैं। ऋण सुविधा, उद्यम स्थापना में सहयोग, निरंतर परामर्श और अनुवर्ती मार्गदर्शन के माध्यम से आरएसटीआई यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रशिक्षण केवल शिक्षण तक सीमित न रहे, बल्कि उसे स्थायी आजीविका और आर्थिक सशक्तिकरण में भी परिवर्तित किया जा सके।
विविध क्षेत्रों में 73 प्रशिक्षण पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं
आरएसटीआई के माध्यम से कृषि, विनिर्माण, सेवा और उद्यमिता जैसे विविध क्षेत्रों में 73 प्रशिक्षण पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं, जिन्हें राष्ट्रीय कौशल मानकों के अनुरूप तैयार किया गया है। इन पाठ्यक्रमों का उद्देश्य प्रतिभागियों को केवल तकनीकी दक्षता प्रदान करना नहीं, बल्कि उन्हें सफल उद्यमी बनने के लिए आवश्यक व्यावहारिक ज्ञान और व्यावसायिक कौशल से भी सुसज्जित करना है। प्रशिक्षण के बाद प्रायोजक बैंक व्यवहार्य उद्यमों की स्थापना के लिए ऋण उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कौशल विकास, वित्तीय सहायता और सतत मार्गदर्शन का यह समन्वित मॉडल सुनिश्चित करता है कि अर्जित कौशल केवल प्रशिक्षण तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें वास्तविक आर्थिक गतिविधियों और स्थायी आजीविका में परिवर्तित किया जा सके। अनेक ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए यही समग्र सहायता प्रणाली वह निर्णायक मोड़ सिद्ध होती है, जहां से आत्मनिर्भरता की दिशा में उनकी नई यात्रा प्रारंभ होती है और संभावनाएं साकार रूप लेने लगती हैं।विष्णु बाई अक्सर उस विश्वास को याद करती हैं, जिसने उनके पूरे जीवन की दिशा तय की अर्थात जो दूसरों का उत्थान करता है, जीवन स्वयं उसका मार्ग भी प्रशस्त करता है। उनका जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ, जहां जीवन की प्राथमिकताएं दैनिक आवश्यकताओं तक ही सीमित थीं और बड़े सपने देखने की गुंजाइश बहुत कम थी। आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण उनकी पढ़ाई आठवीं कक्षा के बाद ही रुक गई। कम उम्र में उनका विवाह हो गया और उनके कंधों पर नई ज़िम्मेदारियां आ गईं, लेकिन विवाह के केवल अठारह महीने बाद ही उन्हें मायके लौटना पड़ा।उनकी ससुराल गहरे आर्थिक संकट से गुजर रही थी, जिससे वहां रहना संभव नहीं रह गया। जब उन्होंने अपने भाइयों से आर्थिक सहायता की आशा जताई, तो उन्हें निराशा ही हाथ लगी। उस कठिन समय में उन्होंने हार मानने के बजाय आत्मनिर्भर बनने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने घर से ही कपड़े सिलाई का शुरू किया। सिलाई से होने वाली हर छोटी-बड़ी कमाई केवल आय का साधन नहीं थी, बल्कि उनके आत्मविश्वास, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता हुआ एक सशक्त कदम भी थी।उनके जीवन में वास्तविक परिवर्तन तब आया, जब वे श्री राम स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। इसी समूह के माध्यम से उन्हें भोपाल के ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (आरसेटीआई) द्वारा संचालित कौशल विकास प्रशिक्षणों की जानकारी मिली। वे अन्य महिलाओं की तरह सिलाई का प्रशिक्षण लेकर आत्मनिर्भर बनना चाहती थीं लेकिन सामाजिक परंपराएं और आवागमन की सीमाएं उनके रास्ते में बड़ी बाधा बनकर खड़ी थीं। उन्होंने हार मानने के बजाय समाधान खोजा। उन्होंने संस्थान से आग्रह किया कि प्रशिक्षण उनके गांव में ही आयोजित किया जाए, ताकि अधिक से अधिक महिलाएं इसमें भाग ले सकें। उनकी पहल को स्वीकार किया गया और गांव का पंचायत भवन सीखने और नए सपनों को आकार देने का केंद्र बन गया। वहीं महिलाओं ने एक साथ बैठकर सिलाई-कढ़ाई की बारीकियां सीखीं और छोटे व्यवसाय को सफलतापूर्वक संचालित करने के आवश्यक कौशल भी हासिल किए। अनेक महिलाओं के लिए यह अनुभव केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं था, बल्कि घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और नए अवसरों की दुनिया में रखा गया उनका पहला कदम था।प्रशिक्षण पूरा होने के बाद विष्णु बाई ने अपने गांव में एक छोटी-सी सिलाई की दुकान शुरू की। शुरुआत महिलाओं के कपड़ों की सिलाई से हुई, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने पुरुषों के परिधान भी सिलने शुरू कर दिए। उनके काम की गुणवत्ता और मेहनत ने उन्हें जल्द ही पहचान दिलाई। जब उन्हें सरकारी स्कूलों की यूनिफॉर्म सिलने का ऑर्डर मिला, तो उनके व्यवसाय को नई गति मिली। नियमित आय के साथ उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता गया। बढ़ती मांग को देखते हुए उन्होंने औद्योगिक सिलाई मशीनें खरीदीं, जिससे उनका काम और अधिक व्यवस्थित तथा व्यापक हो गया। इस तरह उन्होंने अपने परिश्रम और लगन के बल पर एक स्थायी आजीविका स्थापित की।
उमेश शिवाजी इंगले की कहानी
आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आने के कारण उमेश केवल दसवीं कक्षा तक ही शिक्षा प्राप्त कर सके। इसके बाद लगभग पांच वर्षों तक उन्होंने एक नूडल फैक्ट्री में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम किया। लंबे समय तक कठिन परिश्रम करने के बावजूद उनकी आय इतनी नहीं थी कि परिवार की आवश्यकताओं को सहजता से पूरा कर सके। इसी दौरान एक मित्र ने उन्हें आरएसटीआई के प्रशिक्षण कार्यक्रम की जानकारी दी, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने उद्यमिता विकास कार्यक्रम में प्रवेश लिया और फैक्ट्री में अर्जित अपने व्यावहारिक अनुभव को प्रशिक्षण के माध्यम से नए व्यावसायिक कौशल और प्रबंधन संबंधी ज्ञान से समृद्ध किया।प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्होंने एक पुरानी मशीन और सीमित संसाधनों के साथ अपनी छोटी-सी नूडल निर्माण इकाई स्थापित की। शुरुआती दिनों में उनकी इकाई प्रतिदिन लगभग 1,000 से 1,200 किलोग्राम नूडल्स का उत्पादन करती थी। गुणवत्तापूर्ण उत्पाद और बढ़ती मांग के साथ उनका व्यवसाय निरंतर आगे बढ़ता गया और शीघ्र ही उन्हें लगभग 30,000 रुपये का मासिक लाभ होने लगा। अपने उद्यम के विस्तार के साथ उन्होंने वंचित पृष्ठभूमि की चार महिलाओं को रोजगार प्रदान किया, जिससे उनका व्यवसाय केवल उनकी आजीविका का साधन नहीं रहा, बल्कि अन्य परिवारों की आय का स्रोत भी बन गया।
संजय मलागी की कहानी
वहीं, कर्नाटक के धारवाड़ निवासी संजय मलागी की यात्रा इसी सत्य को प्रतिबिंबित करती है। उनकी कहानी बताती है कि किस प्रकार ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (आरएसटीआई) विविध प्रतिभाओं और सपनों को सफल उद्यमों में बदलने का माध्यम बनते हैं। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पूरा करने के बाद संजय ने बेंगलुरु की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी शुरू की, लेकिन समय के साथ उन्हें यह महसूस होने लगा कि आर्थिक स्थिरता के बावजूद उनके काम में वह संतोष और उद्देश्य नहीं है जिसकी उन्हें तलाश थी। अंततः उन्होंने नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया और अपने भविष्य की नई दिशा खोजने के लिए अपने गृह नगर लौट आए। इसी दौरान उन्हें आरएसटीआई, धारवाड़ द्वारा संचालित फोटोग्राफी प्रशिक्षण कार्यक्रम की जानकारी मिली। उन्होंने इस पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया। यह शुरुआत में केवल एक जिज्ञासा थी, वही धीरे-धीरे उनके जीवन का जुनून और एक स्पष्ट उद्यमशील दृष्टि बन गई। वर्ष 2019 में उन्होंने अपनी कंपनी ‘सिनेविंक्स’ की स्थापना की और दृश्य माध्यमों के जरिए कहानी कहने की दुनिया में कदम रखा। आज उनका कार्य केवल फोटोग्राफी तक सीमित नहीं है, बल्कि वीडियोग्राफी, वीडियो संपादन और निर्देशन जैसे अनेक रचनात्मक क्षेत्रों तक विस्तृत है।संजय मलागी की रचनात्मक यात्रा ने शीघ्र ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनानी शुरू कर दी। उनकी फिल्म ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’, जिसमें बुनकर समुदाय के संघर्षों और जीवन की चुनौतियों को संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया गया है, को दो अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए।उनकी एक अन्य चर्चित फिल्म ‘हिनोटा’ ने उन्हें वर्ष 2020–21 में कोचीन अंतरराष्ट्रीय लघु फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का सम्मान दिलाया। समय के साथ उनकी रचनात्मक प्रतिभा को व्यापक सराहना मिली और उन्होंने लगभग दस प्रतिष्ठित पुरस्कार अपने नाम किए। इन उपलब्धियों ने उन्हें एक संवेदनशील और प्रभावशाली फिल्मकार के रूप में स्थापित किया, जो सामाजिक सरोकारों को सशक्त कहानी कहने की कला के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी कंपनी ‘सिनेविंक्स’ ने भी निरंतर विस्तार किया और कई शहरों में अपना परिचालन शुरू किया।विभिन्न व्यावसायिक और रचनात्मक परियोजनाओं के माध्यम से उन्होंने न केवल अपने उद्यम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी सृजित किए। इस प्रकार उनकी सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित नहीं रही, बल्कि रचनात्मक उद्यमिता के माध्यम से समाज और स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी सकारात्मक योगदान का माध्यम बनी।विष्णु बाई, उमेश शिवाजी इंगले और संजय मलागी जैसी प्रेरक यात्राएं मिलकर देशभर में आकार ले रहे एक व्यापक परिवर्तन की कहानी कहती हैं।
33 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 632 ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान कार्यरत
आपको बता दें, मार्च 2026 तक 33 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 632 ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (आरएसटीआई) कार्यरत हैं। ये संस्थान 619 जिलों तक अपनी पहुंच बना चुके हैं और इन्हें देशभर के 25 प्रायोजक बैंकों का सहयोग प्राप्त है। वर्ष 2009 में स्थापना के बाद से लेकर फरवरी 2026 तक आरसेटीआई नेटवर्क ने निरंतर विस्तार और उल्लेखनीय प्रभाव का परिचय दिया है। इस अवधि में 60.81 लाख प्रशिक्षण के लक्ष्य के मुकाबले 60.63 लाख अभ्यर्थियों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया, जो लगभग 99.7 प्रतिशत लक्ष्य प्राप्ति को दर्शाता है। इनमें से 43.89 लाख प्रशिक्षुओं ने स्थायी आजीविका स्थापित करने में सफलता प्राप्त की, जबकि संस्थागत सहयोग के माध्यम से 22.52 लाख लाभार्थियों को बैंक ऋण उपलब्ध कराया गया। यह आंकड़े इस बात के प्रमाण हैं कि आरएसटीआई केवल कौशल विकास तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रशिक्षण, वित्तीय समावेशन और उद्यम स्थापना को जोड़ने वाले एक समग्र आजीविका मॉडल के रूप में कार्य कर रहे हैं।
6.21 लाख अभ्यर्थियों को मिला प्रशिक्षण
हाल के वर्षों में इस पहल की पहुंच और प्रभावशीलता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विशेष रूप से, वित्तीय वर्ष 2024–25 में अब तक का सर्वाधिक वार्षिक प्रदर्शन दर्ज किया गया, जब 6.21 लाख अभ्यर्थियों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया। यह उपलब्धि न केवल कार्यक्रम के विस्तार को दर्शाती है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में कौशल-आधारित आजीविका और उद्यमिता के प्रति बढ़ते विश्वास तथा संस्थागत क्षमता को भी रेखांकित करती है।
