उत्तराखंड डेली न्यूज :ब्योरो
रांची के मनातू गांव में सुरेश के परदादा का लगाया 50 साल पुराना कटहल का पेड़ आज वरदान बन गया है. यह पेड़ भीषण गर्मी में ठंडी छांव देता है. इसके फल बाजार में ₹50 किलो बिकते हैं. सुरेश हर दिन ₹1500 तक की कमाई कर रहे हैं. यह पेड़ प्यार और आमदनी दोनों दे रहा है.झारखंड की राजधानी रांची के ग्रामीण इलाकों में कटहल के पेड़ों की बहुतायत है, लेकिन रांची के मनातू गांव में एक ऐसा पेड़ है जो आज मिसाल बन गया है. यह पेड़ न केवल एक परिवार को तपती धूप से बचा रहा है, बल्कि उनके लिए हर दिन आमदनी का एक बड़ा जरिया भी बना हुआ है. ग्रामीण सुरेश बताते हैं कि उनके परदादा द्वारा 50 साल पहले लगाया गया यह कटहल का पेड़ आज उनके परिवार के लिए ‘आशीर्वाद’ साबित हो रहा है.गर्मी का ‘प्राकृतिक छाता’ और ठंडी हवा,मनातु गांव के सुरेश बताते हैं कि यह पेड़ इतना विशाल और घना है कि इसे ‘गर्मी का प्राकृतिक छाता’ कहा जा सकता है. दोपहर की कड़कती धूप में भी इसकी छांव के नीचे सूर्य की एक किरण तक नहीं पहुंच पाती. गांव के लोग अक्सर दोपहर में इसी पेड़ के नीचे बैठकर गप्पे लड़ाते हैं और ठंडी हवा का आनंद लेते हैं. सुरेश के अनुसार, पूर्वजों की यह विरासत उन्हें सुकून के साथ-साथ आर्थिक मजबूती भी दे रही है.हर दिन ₹1500 का ‘फल’ सिर्फ छांव ही नहीं, इस पेड़ का फल बाजार में हाथों-हाथ बिकता है। सुरेश बताते हैं कि पेड़ की एक-एक डाली पर 10 से 15 कटहल लदे हुए हैं. बाजार में ताजा कटहल की मांग काफी ज्यादा है और यह ₹50 प्रति किलो तक आसानी से बिक जाता है. सुरेश हर दिन पेड़ से लगभग 25-30 किलो ताजा कटहल तोड़ते हैं, जिससे उन्हें रोजाना ₹1500 तक की कमाई हो जाती है.ग्राहकों की पहली पसंद,इस पेड़ के कटहल इतने मशहूर हैं कि कई लोग तो सीधे पेड़ के पास ही खरीदारी करने पहुंच जाते हैं. सुरेश ग्राहकों के सामने ही पेड़ से ताजा फल तोड़कर और काटकर देते हैं. वह बताते हैं कि उनके पास कटहल के और भी पेड़ हैं, लेकिन इस विशेष पेड़ के फल वे बाजार में बेचते हैं, जबकि अन्य पेड़ों के फल खुद के खाने और रिश्तेदारों को भेजने के काम आते हैं.सुरेश बड़े गर्व से कहते हैं, “यह पेड़ हमारे लिए प्यार और अपनापन बढ़ाने का जरिया भी है. हम अपने ससुराल और अन्य करीबियों को भी यहां के कटहल भेजते हैं. वाकई, यह एक पेड़ है लेकिन इसके काम अनेक हैं.” यह कहानी दर्शाती है कि अगर सही मंशा से पेड़ लगाए जाएं, तो वे आने वाली पीढ़ियों के लिए न केवल पर्यावरण बल्कि आर्थिक सुरक्षा का भी आधार बनते हैं.
