उत्तराखंड डेली न्यूज:ब्योरो
अब जैसे ही 2027 नज़दीक दिख रहा है, अचानक “भूमि बचाओ” की राजनीति शुरू हो गई।
सच तो ये है कि पहाड़ की जमीन कहीं उठाकर कोई ले नहीं जा रहा, वो वहीं रहेगी।
लेकिन सवाल ये भी है कि जो लोग आज बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं, उनमें से कितने लोग खुद पहाड़ में रह रहे हैं?
देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी, दिल्ली तक पलायन किसने किया?
क्या वहां जमीन नहीं खरीदी गई? क्या किसी ने किसी से मकान और प्लॉट नहीं लिए?
पहाड़ का असली दर्द सिर्फ जमीन नहीं, बल्कि बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और पलायन है।
अगर युवाओं को गांव में रोजगार मिलता, अच्छी सड़कें, अस्पताल और स्कूल मिलते, तो लोग अपना घर-गांव छोड़कर मैदानों की ओर क्यों जाते?हर चुनाव से पहले भावनाएं भड़काने से बेहतर है कि पहाड़ में उद्योग, पर्यटन, शिक्षा और रोजगार की मजबूत नीति बनाई जाए।उत्तराखंड की संस्कृति और मूल निवास की रक्षा जरूरी है, लेकिन उसके नाम पर सिर्फ राजनीतिक रोटियां सेंकना सही नहीं।
✊ पहाड़ बचाना है तो पहले पहाड़ में जीवन बचाना होगा।
