
उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो
आमतौर पर दशहरे पर रावण के पुतले का दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है, लेकिन ब्यावरा के भाटखेड़ी गांव में परंपरा इससे बिल्कुल अलग है। यहां रावण और कुंभकर्ण की प्रतिमाओं को जलाया नहीं जाता, बल्कि विजयादशमी पर उनका शृंगार कर पूजा-अर्चना की जाती है। करीब 150 साल पुरानी यह परंपरा आज भी कायम है। गांव में स्थापित ये प्रतिमाएं अब केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भाटखेड़ी की विशिष्ट पहचान भी बन चुकी हैं।गांव में रावण और कुंभकर्ण की प्रतिमाओं को देखने के लिए लोगों में उत्सुकता रहती है। दशहरे के अवसर पर प्रतिमाओं का शृंगार किया जाता है और श्रद्धालु उनकी पूजा करते हैं। ग्रामीणों की मान्यता और परंपरा के अनुसार यहां रावण-कुंभकर्ण के पुतलों का दहन नहीं किया जाता। यही वजह है कि विजयादशमी पर भी गांव का दृश्य दूसरे स्थानों से अलग नजर आता है।
150 साल पुरानी परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार रावण-कुंभकर्ण की प्रतिमाएं करीब डेढ़ सदी पुरानी हैं। इन्हें किसने बनवाया, इसका कोई स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है। बताया जाता है कि प्रतिमाओं का निर्माण उस दौर में मिट्टी और चूने से किया गया था। समय के साथ इनके रखरखाव और शृंगार की परंपरा आगे बढ़ती रही। गांव के बुजुर्गों के पास भी इनके निर्माण को लेकर अलग-अलग जानकारियां हैं, लेकिन कोई निश्चित ऐतिहासिक दस्तावेज सामने नहीं आया है।ग्रामीणों की आस्था के पीछे धार्मिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं। कुछ लोगों के अनुसार रावण भगवान शिव का भक्त और विद्वान था, जबकि कुंभकर्ण को भी उसके विशिष्ट गुणों के लिए याद किया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि इन प्रतिमाओं के प्रति उनकी श्रद्धा स्थानीय परंपरा का हिस्सा है। हालांकि, इस मान्यता को लेकर गांव में सभी की एक जैसी राय नहीं है।हर मनोकामना होती है पूरी ग्रामीण राधेश्याम यादव ने बताया कि रावण कुम्भकरण की प्रतिमा केवल विजयादशमी के दिन ही नहीं पूजी जाती। यह स्थान लोगों की आस्था का केंद्र है। लोग अपनी मनोकामना पूरी होनें के लिए रावण का आह्वान करते हैं। कई बार बारिश नहीं होने पर रावण की पूजा और बारिश की कामना के बाद बारिश का होना आस्था का उदारहण है। इसके अलावा यहां लोगों की व्यक्तिगत मनोकामना पूरी भी होती है। विरासत को सहेज रहा भातखेड़ी गांव भाटखेड़ी की यह परंपरा बताती है कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में दशहरे से जुड़ी मान्यताएं और परंपराएं अलग-अलग रूपों में जीवित हैं। यहां रावण-कुंभकर्ण की प्रतिमाओं का दहन न होना और हर साल उनका शृंगार किया जाना गांव की सांस्कृतिक विरासत का ऐसा पहलू है, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजने की जरूरत है।प्राचीन प्रतिमा के संरक्षण की आवश्यकता ग्रामीणों के मुताबिक बारिश के दौरान प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचने की आशंका बनी रहती है। इस बार भी बारिश के कारण इनके आसपास की संरचना और सुरक्षा को लेकर चिंता सामने आई। ऐसे में प्रतिमाओं के संरक्षण और सुरक्षित रखरखाव की जरूरत महसूस की जा रही है।
प्रतिमाओं के लिए मंदिर की मांग
गांव के राधेश्याम यादव, नरसिंह लाल, मनोहर यादव, हरिप्रसाद यादव, का मानना है कि प्रतिमाओं के लिए मंदिर बनाया जाना चाहिए, ताकि वर्षों पुरानी विरासत को सुरक्षित रखा जा सके। इस मांग को लेकर सहमति बनाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं, हालांकि मंदिर निर्माण को लेकर सभी ग्रामीणों की एक राय नहीं है।

