
उत्तराखंड डेली न्यूज़: ब्योरो

हमारी नई पीढ़ी तो क्या, हमसे पहले की पीढ़ी भी अपने आसपास के उस गौरवशाली इतिहास से लगभग अनजान है, जिसमें काकोरी काण्ड के 17 वर्ष बाद, अगस्त 1942 में कर्णप्रयाग की धरती पर अंग्रेजी हुकूमत को सीधी चुनौती दी गई थी। यह कोई सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में पहाड़ की दुर्गम परिस्थितियों के बीच रची गई एक साहसिक क्रांतिकारी योजना थी, जिसका कर्णप्रयाग एक महत्वपूर्ण केंद्र बना।
1942 में महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान से पूरा देश आंदोलित था। गढ़वाल भी इस आंदोलन की आग से अछूता नहीं था। कप्तान राम प्रसाद नौटियाल ने अंग्रेजी शासन के महत्वपूर्ण सैन्य केंद्र लैंसडौन पर कब्जा करने की योजना बनाई। इस अभियान के लिए आवश्यक विस्फोटक जुटाना भी योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा था।20 अगस्त 1942 के आसपास कप्तान राम प्रसाद नौटियाल कर्णप्रयाग पहुंचे। कर्णप्रयाग में मैगजीन से डायनामाइट निकालने की कार्रवाई को अंजाम देने में उनके प्रमुख स्थानीय सहयोगियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। इनमें जीवानन्द खंडूरी, थोकदार देवानंद, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा और योगेश्वर प्रसाद खंडूड़ी प्रमुख थे। उपलब्ध विवरण के अनुसार, रात करीब एक बजे थोकदार देवानंद और जीवानन्द खंडूरी की मदद से PWD मैगजीन स्टोर का ताला तोड़ा गया और वहां से डायनामाइट की सात पेटियां निकाल ली गईं।
उस समय यह कोई मामूली चोरी या सरकारी सामान की लूट नहीं थी। अंग्रेजी राज के दौर में उसके सरकारी मैगजीन स्टोर से विस्फोटक निकालना ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती थी। वह डायनामाइट आगे लैंसडौन में अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रस्तावित क्रांतिकारी अभियान के लिए इस्तेमाल किया जाना था।
आज हम कर्णप्रयाग से लैंसडौन तक सड़क और वाहनों से आसानी से पहुंच सकते हैं, लेकिन उस समय पहाड़ की परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं। दुर्गम रास्ते, जंगल, नदियां, सीमित यातायात और ऊपर से अंग्रेजी पुलिस तथा मुखबिरों का खतरा। इसके बावजूद कर्णप्रयाग से निकाली गई डायनामाइट को अलग-अलग रास्तों से आगे पहुंचाया गया और अभियान के लिए चार कमानों में भेजा गया। यह उस समय के क्रांतिकारियों के साहस, संगठन और गोपनीयता का बड़ा प्रमाण था।
कर्णप्रयाग की इस कार्यवाही के पीछे केवल कुछ लोगों की योजना नहीं थी। इसके साथ एक व्यापक क्रांतिकारी संगठन काम कर रहा था। गुप्त बैठकों में सदानंद शास्त्री, चन्द्रसिंह रावत वकील, थोकदार नारायण सिंह, पान सिंह रावत, गोकुल सिंह नेगी और छवाण सिंह नेगी सहित अनेक साथियों को जिम्मेदारियां दी गईं। अलग-अलग क्षेत्रों से जत्थे तैयार किए गए और लैंसडौन अभियान के लिए कार्यकर्ताओं को संगठित किया गया।
इस व्यापक अभियान से जुड़े नामों में छवाण सिंह नेगी, गोपाल सिंह, लीलानंद डबराल, चन्द्र सिंह रावत, कुंवर मस्तान, नारदानंद, मास्टर गुलाब सिंह, शीशराम पोखरियाल, थोकदार नारायण सिंह रावत, थान सिंह रावत और बलवंत सिंह रावत जैसे अनेक सेनानी शामिल थे। कर्णप्रयाग की ओर से जीवानन्द खंडूरी, थोकदार देवानंद, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा और योगेश्वर प्रसाद खंडूड़ी प्रमुख स्थानीय सहयोगियों के रूप में इस योजना में जुड़े थे।
योजना केवल लैंसडौन तक पहुंचने की नहीं थी। पहले अंग्रेजों की संचार व्यवस्था को ठप करने के लिए टेलीफोन की तारें काटने, फिर प्रशासनिक व्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करने और जनता के हाथों में व्यवस्था सौंपने की योजना बनाई गई थी। विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोगों को जुटाया गया। करीब एक हजार कार्यकर्ताओं को अभियान के लिए तैयार करने की योजना थी।
27 अगस्त 1942 को हजारों कार्यकर्ता और देशभक्त लैंसडौन की ओर बढ़े। अंग्रेजी प्रशासन को इस योजना की जानकारी मिल चुकी थी। ब्रिटिश प्रशासन ने लैंसडौन की ओर जाने वाले रास्तों पर सेना और पुलिस तैनात कर दी। महत्वपूर्ण पुलों और मार्गों को रोक दिया गया। इस तरह अंग्रेजी शासन ने इस क्रांतिकारी अभियान को रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी।
इसी अभियान के दौरान केशर सिंह जैसे वीर ने अपना जीवन बलिदान किया। धुरा चुंगी के पास टेलीफोन की तार काटते समय उन्हें बिजली का करंट लगा और वे शहीद हो गए। यह बलिदान बताता है कि उस समय आजादी के लिए संघर्ष करने वालों के सामने जोखिम कितना बड़ा था।
कप्तान राम प्रसाद नौटियाल और उनके साथियों की योजना अपने अंतिम लक्ष्य तक भले ही नहीं पहुंच सकी, लेकिन उसका ऐतिहासिक महत्व कम नहीं होता। इसने साबित कर दिया कि 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन पहाड़ों तक केवल सभाओं, नारों और जुलूसों के रूप में नहीं पहुंचा था। पहाड़ के लोग भी अंग्रेजी सत्ता को सीधी चुनौती देने और उसके प्रशासनिक तथा सैन्य ढांचे को कमजोर करने के लिए तैयार थे।
यही वह कारण है कि कर्णप्रयाग काण्ड को गढ़-कुमाऊँ के काकोरी काण्ड के समतुल्य एक साहसिक क्रांतिकारी घटना के रूप में याद किया जाना चाहिए।
1925 के काकोरी काण्ड में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद और रोशन सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी थी। उसके 17 वर्ष बाद, 1942 में पहाड़ की दुर्गम धरती पर कप्तान राम प्रसाद नौटियाल और उनके साथियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक ऐसी साहसिक योजना को आगे बढ़ाया, जिसमें उसके सरकारी संसाधनों को ही स्वतंत्रता के संघर्ष के लिए इस्तेमाल करने का जोखिम उठाया गया।
दोनों घटनाएं ऐतिहासिक रूप से एक जैसी नहीं थीं, लेकिन साहस, जोखिम, गोपनीयता, संगठन और अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह की भावना में एक गहरी समानता जरूर दिखाई देती है। काकोरी के नायकों ने देश के लिए अपना जीवन दांव पर लगाया था, उसी तरह कर्णप्रयाग और गढ़वाल के इन क्रांतिकारियों ने भी पहाड़ की कठिन परिस्थितियों में अंग्रेजी शासन को चुनौती देने का साहस किया।
इसलिए कप्तान राम प्रसाद नौटियाल, जीवानन्द खंडूरी, थोकदार देवानंद, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, योगेश्वर प्रसाद खंडूरी और इस अभियान से जुड़े अन्य ज्ञात-अज्ञात सेनानी भी हमारे सम्मान और स्मरण के उतने ही अधिकारी हैं। दुर्भाग्य यह है कि काकोरी के नायकों की तरह कर्णप्रयाग की इस गौरवगाथा को वह व्यापक पहचान नहीं मिल पाई, जिसकी वह हकदार है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस स्थान ने इस ऐतिहासिक घटना को देखा, वह आज भी हमारे सामने मौजूद है। अपर बाजार, कर्णप्रयाग के निकट स्थित पुराना PWD मैगजीन स्टोर इस इतिहास का जीवंत गवाह है। यह केवल एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के उस अध्याय की निशानी है, जब इसी स्थान से अंग्रेजी शासन के खिलाफ चल रहे क्रांतिकारी अभियान के लिए डायनामाइट निकाली गई थी।
सरकार से मेरा विनम्र आग्रह है कि इस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित कर ‘कर्णप्रयाग स्वतंत्रता संग्राम स्मारक’ के रूप में विकसित किया जाए। यहां कप्तान राम प्रसाद नौटियाल तथा कर्णप्रयाग और इस व्यापक अभियान से जुड़े सेनानियों के स्मृति-चिह्न स्थापित किए जाएं। इस पूरे घटनाक्रम को चित्रों, दस्तावेजों, अभिलेखों और सरल भाषा में प्रदर्शित किया जाए, ताकि यहां आने वाली नई पीढ़ी जान सके कि आजादी की लड़ाई केवल दिल्ली, लखनऊ और दूसरे बड़े शहरों में नहीं लड़ी गई थी।
वह लड़ाई हमारे पहाड़ों में भी लड़ी गई थी।
हमारी पगडंडियों पर लड़ी गई थी।
और कर्णप्रयाग की इसी धरती पर भी लड़ी गई थी।
काकोरी के वीरों को देश ने इतिहास में उनका स्थान दिया। अब समय आ गया है कि कर्णप्रयाग के इन वीरों की कहानी को भी विस्मृति से निकालकर इतिहास के सामने रखा जाए।
अपर बाजार के निकट खड़ा वह क्रांति का गवाह पी डब्ल्यू डी मैगजीन स्टोर आज भी जैसे हमसे कह रहा है –
अपने इतिहास को पहचानो,अपने वीरों को याद करो और इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाकर रखो।
कर्णप्रयाग काण्ड को उसका इतिहास चाहिए, उसके सेनानियों को उनका सम्मान चाहिए और उस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षण चाहिए।यही उन ज्ञात-अज्ञात क्रांतिकारियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने अपना आज दांव पर लगाकर हमारे आजाद भारत के भविष्य की नींव रखी।
