उत्तराखंड डेली न्यूज :ब्योरो
आचार्य चाणक्य ने अपने ग्रंथ नीति शास्त्र में बच्चों और माता-पिता से जुड़ी कई नीतियों का वर्णन किया है। एक श्लोक के माध्यम से बताया है कि कौन-से माता-पिता बच्चों के लिए शत्रु समान होते हैं।आचार्य चाणक्य ने नीति शास्त्र में मानव जीवन से जुड़े कई पहलुओं पर अपने विचार या राय साझा की है। आचार्य चाणक्य की नीतियां थोड़ी कठोर और मुश्किल लगती हैं, जिसके कारण इन्हें अपनाना थोड़ा मुश्किल लगता है। कहा जाता है कि अगर चाणक्य नीति का पालन किया जाए तो, यह व्यक्ति को सफलता और तरक्की दिला सकती हैं। नीति शास्त्र में आचार्य चाणक्य ने माता-पिता, संतान, परिवार, शत्रु और धन आदि सभी विषयों से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें बताई हैं। एक श्लोक के माध्यम से उन्होंने माता-पिता और संतान के रिश्ते को लेकर भी अपने विचार साझा किए हैं। आचार्य ने कुछ ऐसी स्थितियों या हालातों का वर्णन किया है जब माता-पिता संतान के लिए शत्रु समान हो जाते हैं।
श्लोक का अर्थ:
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि वे माता-पिता बच्चों के शत्रु हैं, जिन्होंने उन्हें पढ़ाया-लिखाया नहीं है। क्योंकि अनपढ़ बालक विद्वानों के समूह में शोभा या सम्मान नहीं पाते हैं, ऐसे बच्चों का हमेशा अपमान होता है। विद्वानों के समूह में उसका अपमान उसी तरह से होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है।
श्लोक का सार:
आचार्य चाणक्य के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जन्म से ही विद्वान या पढ़ा-लिखा नहीं होता है। उसके लिए उसका शिक्षित होना जरूरी है। शक्ल-सूरत और रंग-रूप तो सभी मनुष्यों के पास होता है, लेकिन उनमें अंतर उनकी बुद्धिमत्ता से किया जाता है। जिस तरह से सफेद बगुला हंसों के बीच रह कर हंस नहीं बन सकता है, उसी तरह से अनपढ़ व्यक्ति शिक्षित लोगों के बीच बैठकर शोभा नहीं पा सकता है। इसलिए हर माता-पिता का कर्तव्य है कि वह अपने बच्चों को शिक्षित करें, जिससे वह समाज में सम्मान पा सकें।श्लोक का अर्थ है:
प्यार-दुलार करने से पुत्रों में बहुत सारी बुरी आदतें और दोष हो जाते हैं, इसलिए उन्हें दंड देना या डांटना चाहिए, इससे उनमें गुणों का विकास होता है। आचार्य चाणक्य के अनुसार, पुत्रों और शिष्यों को अधिक प्यार-दुलार नहीं करना चाहिए, उनकी ताड़ना (डांट लगाना) भी करनी चाहिए।
