
उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो
देहरादून, दून में तीन दिवसीय किताब कौतिक का शुक्रवार को दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के संस्थापक प्रो० बी. के. जोशी, पद्मश्री बसंती बिष्ट, पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने दीप प्रज्वलित कर विधिवत् उद्धघाटन किया।इस मौके पर बीके जोशी ने कहा कि यह किताब कौतिक अच्छा विचार है। कहा कि यदि आयोजक चाहें तो इसे हर वर्ष किया जा सकता है।कल्याण सिंह रावत ने कहा कि किताबें जिंदगी को सुव्यवस्थित करती है। किताबों से सकारात्मक ज्ञान बढ़ता है। उन्होंने बढ़ते प्राकृतिक खतरों की और संकाये व्यक्त की है। हिमालय में बढ़ते खतरों से हमे स्वयं बचना है। वहीं बसंती बिष्ट ने कहा कि किताबों में बहुत आकर्षण रहता है। किताबों से ही हमारी जानकारी का विस्तार होता है। दुनिया के विद्वान और परिस्थितियों से हम किताबों को पढ़ने से साक्षात् होते हैं। उन्होंने कहा कि आज उनका जो परिचय समाज के सामने है वह भी किताबों के मार्फत हुआ है।उद्घाटन कार्यक्रम तीन सत्रों में संपन्न हुआ, दूसरे सत्र में देहरादून इतिहास, विरासत और भविष्य में बोलते हुए,इतिहासकार अजय शर्मा ने कहा कि देहरादून का इतिहास अपने आप में खास है। कहा कि गंगा और यमुना के मध्य 50 किमी का यह दायरा इतिहास की कई कहानियां समेटी है। अशोक का शिलालेख इसका सीधा साधा उदाहरण है।बाड़वाला भी तीसरी और चौथी सदी का भी इतिहास बताता है। जहां राजा शील वर्मन ने यज्ञ करवाया था। देहरादून के कई क्षेत्रों का इतिहास बताया है। बंजारावाला देहरादून में है। यानि गंगा यमुना के इस आबाद क्षेत्र में कई बंजारा वाला है। 14 नदियाँ है लांघा से रानी पोखरी तक जो नदिया बहती है वह सभी मसूरी के लैंडस्केप से निकलती है। मुगलो, गुरु राम राय का भी इतिहास बताया है। गुरुराम राय ने जब आज के देहरादून के धामावाला में डेरा डाला तो उसके बाद यह पूरा क्षेत्र डेरा से डेराडून अर्थात देहरादून हो गया।विजय भट्ट ने कहा कि 1804 में नेपाल आक्रमण हुआ। 1803 के भूकंप ने संपूर्ण गढ़वाल को संकट में डाला है।नेपाल और गढ़वाल राजा के बीच 1804 में विशाल युद्ध होता है जिसने प्रद्युम्न शाह मारे जाते है। नेपाल का शासन हो जाता है। एंग्लो गोरखा युद्ध 1814 में हुआ जिस कारण अभूतपूर्व परिवर्तन आता है। 1815 में यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आ जाता है। 1823 में रुड़की देहरा राजपुर पहली सड़क बनी। फिर पलटन बाजार, मिशनरी स्कूल आदि आदि का विकास और देहरादून में इस तरह कई परिवर्तन हुए है। इस शहर को बसाने का सबसे बड़ा श्रेय नगर के सेठ लोगो का रहा है। दुनिया का पहला पर्यावरणीय स्कूल इम्पीरियल स्कूल यहां स्थापित हुआ।योगेश भट्ट ने कहा कि राज्य बनने के बाद देहरादून बहुत तेजी से बदला है। राज्य बनने से पूर्व यहां की शांत वादियां थी। यहां जो आया वह यहीं का हो गया। यह शहर कैसे बदला की सबसे पहले यहां की ईस्ट और वेस्ट कैनाल जमीदोज कर दी। नगर भारी शहरीकरण में तब्दील हुआ। कहा कि जब बंगाली कोठी एक दिन में चार बार बिकती है, अपार्टमेंट बन गए, देहरादून में असुरक्षा बढ़ गई। पिछले 25 सालों में जो बदलाव देहरादून में हुआ वह अकल्पनीय रहा है, इस सत्र के समन्वय संचालन की भूमिका में राहुल कोटियाल ने निभाई।वहीं तीसरे सत्र में देहरादून का साहित्यिक परिदृश्य पर बोलते हुए डॉ. इंद्रजीत सिंह ने कहा कि FRI में कार्यरत रहे एक वैज्ञानिक देहरादून के जाने माने साहित्यकार रहे है। डॉ पूर्ण सिंह के नाम पर FRI परिसर में सम्पूर्ण जानकारी है। लीलाधर जगूड़ी देहरादून के साहित्य से जाना जाता है। दिवंगत सुभाष पंत जैसे साहित्यकारों ने राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। मनमोहन चड्ढा भी देहरादून वासी है। कहा कि देहरादून में जैसे नहरें समाप्त हुई है उसी तरह यहां की साहित्यिक पत्रिका भी बंद होती गई। उन्होंने कहा कई साहित्यिक हस्तियों का जिक्र किया है। जिनका देहरादून से वास्ता रहा है।राजेश सकलानी ने कहा कि देहरादून का वातावरण लोगों लेखक बना ही देता है।देहरादून की पहचान एक शब्द से बहुत चर्चित है। “भाईजी” शब्द का यदि उच्चारण होता है तो एकदम मालूम हो जाता है कि यह व्यक्ति देहरादून का है।सरदार पूर्ण सिंह, एम एन रॉय जैसे दो ऐसे व्यक्तित्व रहे है जिन्होंने 1900 से पहले साहित्यिक इतिहास में झंडे गाड़ दिया थे। ये भी देहरादून वासी है। रशीद जहां भी सौ साल पहले देहरादून आई और परिवर्तकारी साहित्य गढ़ा। शमशेर बहादुर सिंह को आधुनिक कविताओं का जनक कहते है ये भी देहरादून के ही। हरिवंशराय बच्चन 1930 में अपने दोस्त ब्रजेंद्रमोहन गुप्ता के घर देहरादून आए। चंद्र कुंवर बर्त्वाल भी देहरादून में पढ़े है। उन्होंने देहरादून के कई प्रतिष्ठित साहित्यकारों का जिक्र किया है।मुकेश नौटियाल ने कहा कि उनका 1987 के आस पास आना हुआ और यहां सबसे पहले पब्लिक ट्रांसपोर्ट से पाला पड़ा। उन दिनों डीएवी कॉलेज में बड़ा भय और आंदोलन का माहौल रहा है। देहरादून स्वयं में एक अलग प्रकार व्यवस्था थी। उन्होंने कहा कि राज्य बनने से पहले देहरादून एक औपनिवेशिक काल लगता था। मगर राजधानी बनने के बाद देहरादून उत्तराखंड जैसा लगने लगा। राजधानी बनने के बाद देहरादून के लोग गढ़वाल का हिस्सा हुए।उन्होंने कहा कि देहरादून में एक साहित्यिक संग्रहालय बनना चाहिए। कार्यक्रम का समन्वयक संचालन निक्की पुष्कर ने किया है।सुरेंद्र दत्त सेमल्टी की पुस्तक “आओ गढ़वाली सीखें” का लोकार्पण किया गया है और इस पुस्तक पर चर्चा की गई। इस सत्र का समन्वय संचालन ज्योत्सना जोशी ने किया है।देवेश जोशी की पुस्तक उत्तराखंड में रिवर्स माइग्रेशन का लोकार्पण किया गया और पुस्तक पर सारगर्भित चर्चा हुई। समन्वय संचालन मनोज पांडे ने किया है।उत्तराखंड की सैन्य विरासत को संबोधित करते हुए कर्नल सुनील कोटनाला ने सीमाओं पर उत्तराखंड के सैन्य अधिकारियों और अन्य सैनिकों के अदम्य साहस पर कई उदाहरण दिया है। साहित्यकार जोशी ने भी कई उदाहरण बताया है। इस सत्र का समन्वय संचालन पत्रकार शीशपाल गुसाई ने किया।कार्यक्रम का संचालन नवीन पंत ने किया है, इस दौरान वरिष्ठ साहित्यकार मुकेश नौटियाल, वरिष्ठ पत्रकार राहुल कोटियाल, वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व सूचना आयुक्त योगेश भट्ट, साहित्यकार भारती पाण्डेय, विजय रावत आदि मौजूद रहे।

