उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो
हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा अनुबंध किस आधार पर बनाया, कर्मचारियों ने नियमितीकरण मामले में अनुबंध को गलत बताकर हाईकोर्ट में याचिका डाली है,उत्तराखंड हाईकोर्ट से उपनल कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर है. उपनल कर्मचारी नियमितीकरण मामले में नैनीताल हाईकोर्ट ने सख्त रुख दिखाया है. राज्य सरकार द्वारा उपनल कर्मचारियों को नियमित किए जाने के मामले में बनाए गए अनुबंध पर कोर्ट ने नाराजगी जताई है.उपनल कर्मचारी नियमितीकरण मामले में नैनीताल हाईकोर्ट सख्त: नैनीताल हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा है कि अनुबंध किस आधार पर बनाया गया है. कर्मचारियों ने नियमितीकरण मामले में अनुबंध बनाए जाना को गलत बताया है. उनका आरोप है कि अनुबंध की शर्त कोर्ट के आदेश के अनुरूप नहीं है. हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया सरकार का ये काम हाईकोर्ट की अवमानना की श्रेणी में आता है.हाईकोर्ट ने सरकार को चार्ज फ्रेम करने की चेतावनी दी: नैनीताल हाईकोर्ट ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि अगर सरकार ने समय पर जवाब नहीं दिया तो कोर्ट चार्ज फ्रेम कर देगी. इसके बाद उत्तराखंड सरकार ने अनुबंध मामले में दो दिन का समय मांगा है. अब अगले मंगलवार को मामले की आगे सुनवाई होगी.नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या हुआ?उत्तराखंड हाईकोर्ट नैनीताल में प्रदेश के सरकारी विभागों में वर्षों से लगे उपनल संविदा कर्मचारियों को आदेश होने के बाद भी सरकार द्वारा नियमित नहीं करने और उन्हें चयनित वेतनमान नहीं दिये जाने तथा उनको दिए गए वेतन से जीएसटी काटे जाने के खिलाफ दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई.आज गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की तरफ से कोर्ट को अवगत कराया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को कैबिनेट में रखा गया है, जिस पर निर्णय लेने के लिए उन्होंने कोर्ट से अतिरिक्त समय देने की मांग की. इस पर न्यायालय ने कहा कि इस विषय पर अलग से समय दिया जाएगा. लेकिन पूर्व के आदेशों का अनुपालन अब तक क्यों नहीं हुआ, जो कि कोर्ट के आदेशों को अवहेलना है. क्यों नहीं सम्बन्धित अधिकारियों के खिलाफ कोर्ट के आदेशों का अनुपालन न करने पर उनके खिलाफ चार्ज फ्रेम किया जाए. इस पर आने वाले मंगलवार तक कोर्ट को अवगत कराएं. आखिरकर कोर्ट के आदेशों का अनुपालन क्यों नहीं हो रहा है.वहीं शासकीय अधिवक्ता द्वारा जवाब दाखिल करने के लिए दो दिन का समय मांगा गया. सुनवाई के दौरान शासन की ओर से प्रस्तुत एक अनुबंध पर भी न्यायालय ने नाराजगी जताई. कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि यह अनुबंध न्यायालय के आदेशों के खिलाफ है. साथ ही न्यायालय ने शासन से यह भी पूछा कि न्यूनतम वेतनमान और जीएसटी कटौती रोकने जैसे स्पष्ट आदेश होने के बावजूद नए अनुबंध की आवश्यकता क्यों पड़ रही है.मामले के अनुसार संविदा कर्मचारी संघ के अधिवक्ताओं ने कोर्ट के समक्ष उनका पक्ष रखते हुए कहा कि पूर्व में कोर्ट की खंडपीठ ने उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण के सम्बंध में एक आदेश जारी किया था. लेकिन इस आदेश पर अब तक राज्य सरकार की तरफ से कोई निर्णय नहीं लिया गया. न ही इसे उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में लाया गया है. पूर्व में संघ की ओर से पेश हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता ने इस अवमानना याचिका पर (उत्तराखंड उपनल कर्मचारी संघ बनाम आनन्द बर्धन, मुख्य सचिव उत्तराखंड) की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की मांग की थी.विभिन्न विभागों में तैनात हैं उपनल कर्मी: गौरतलब है कि प्रदेश के विभिन्न विभागों में बड़ी संख्या में उपनल कर्मी वर्षों से कार्यरत हैं. ये कर्मचारी सैनिक कल्याण विभाग के माध्यम से तैनात किए जाते हैं. आउटसोर्स मॉडल पर काम करते हैं, लेकिन जिन पदों पर ये तैनात हैं, वे मूल रूप से स्थायी प्रकृति के हैं. उन्हें नियमित भर्ती प्रक्रिया के जरिए भरा जाना चाहिए. यही वजह है कि समय-समय पर इन पदों पर सीधी भर्ती को लेकर अधियाचन भेजे जाते रहे हैं.साल 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उपनल कर्मचारियों के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए उन्हें नियमितीकरण और समान कार्य के लिए समान वेतन देने के निर्देश दिए थे. हालांकि, राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. इससे साफ संकेत मिला कि सरकार तत्काल नियमितीकरण के पक्ष में नहीं थी. बावजूद इसके समान वेतन के मुद्दे पर भी लंबे समय तक असमंजस बना रहा. कर्मचारियों को इसका लाभ मिलने में करीब आठ साल का समय लग गया.अनुबंध से सहमत नहीं हैं उपनल कर्मी: हाल के महीनों में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार ने उपनल कर्मियों को समान कार्य के बदले समान वेतन देने की दिशा में पहल की. इसके तहत कर्मचारियों के साथ नए अनुबंध करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई, लेकिन यह प्रस्ताव कर्मचारियों को रास नहीं आया. उनका कहना है कि सरकार अनुबंध के जरिए उनकी सेवाओं को सीमित करना चाहती है, जबकि वे लंबे समय से नियमितीकरण की मांग कर रहे हैं.अब कार्मिक विभाग का यह नया आदेश इस पूरे विवाद के बीच आया है, जिसने चर्चाओं को और तेज कर दिया है. आदेश में साफ कहा गया है कि जिन पदों पर उपनल कर्मी तैनात हैं और जो सीधी भर्ती के दायरे में आते हैं, उन पर अधियाचन भेजने से पहले सभी कानूनी और वित्तीय पहलुओं की गहन जांच की जाए. इसके लिए तीनों अहम विभागों कार्मिक, वित्त और न्याय की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है.उपनल कर्मियों ने लगाया ये आरोप: कर्मचारियों का कहना है कि इस अनुबंध में यह शर्त शामिल की गई है कि वे भविष्य में कभी भी नियमितीकरण की मांग नहीं करेंगे. इसके अलावा अनुबंध में मेडिकल सुविधा, बोनस, सामाजिक सुरक्षा और अन्य जरूरी लाभों का भी स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है. ऐसे में कर्मचारियों को आशंका है कि वे लंबे समय तक अस्थायी स्थिति में ही काम करने को मजबूर रहेंगे.
