उत्तराखंड डेली न्यूज :ब्योरो
देहरादून: उत्तराखंड में हजारों हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट पर अवैध कब्जे बड़ी मुसीबत बने हुए हैं. स्थिति ये है कि करीब 4 सालों से चल रहे अभियान के बावजूद 80 प्रतिशत से भी ज्यादा जंगल अवैध कब्जे की जद में बने हुए हैं. उधर, इस मामले में कुमाऊं का तराई डिवीजन सबसे खराब स्थिति में है. यही नहीं, कई मामलों के न्यायालय में जाने से महकमे की मुश्किलें और भी ज्यादा बढ़ी हुई हैं.उत्तराखंड जिसे देवभूमि और हरियाली से भरपूर पहाड़ी राज्य के रूप में जाना जाता है, आज अपने ही जंगलों को बचाने की जंग लड़ रहा है. राज्य के रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्रों पर बढ़ते अवैध कब्जे न केवल पर्यावरण के लिए खतरा बनते जा रहे हैं, बल्कि वन विभाग की कार्यप्रणाली और व्यवस्थाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं. आंकड़े बताते हैं कि समस्या कितनी गहरी है और उससे निपटने की रफ्तार कितनी धीमी.वन विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में कुल 11 हजार 396.63 हेक्टेयर से अधिक रिजर्व फॉरेस्ट भूमि पर अतिक्रमण हुआ है. इनमें से अभी भी करीब 9 हजार 836 हेक्टेयर क्षेत्र पर अवैध कब्जा बरकरार है. यानी कि बीते वर्षों में चलाए गए अभियानों के बावजूद 70 प्रतिशत से अधिक जंगल अब भी अतिक्रमण की जद में हैं.यह स्थिति तब है जब पिछले चार वर्षों में राज्य सरकार और वन विभाग ने अतिक्रमण हटाने के लिए कई अभियान चलाए. इन अभियानों के तहत कुल 1 हजार 560.31 हेक्टेयर भूमि को अवैध कब्जे से मुक्त कराया गया है. लेकिन इस आंकड़े को कुल अवैध कब्जे के अनुपात में देखें तो यह बेहद कम है, जो यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर कार्रवाई अपेक्षित गति से नहीं हो पा रही है.
