उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो
उत्तराखंड के पूर्व सीएम बीसी खंडूरी प्रदेश की राजनीति में पहले ऐसे नेता रहे, जिन्होंने 5 साल के भीतर दो बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वह पांच बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा के सदस्य भी रहे।उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल (रिटायर्ड) भुवनचंद्र खंडूरी के निधन के साथ ही राजनीति के एक युग का अंत हो गया। खंडूरी दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे। इसके अलावा 5 बार लोकसभा सांसद और एक बार राज्यसभा सांसद भी रहे। राजनीति में खंडूरी की छवि एक सख्त, अनुशासित और ईमानदार नेता के तौर पर रही। बतौर मुख्यमंत्री उनका कार्यकाल भी ऐतिहासिक रहा। हालांकि, इन उपलब्धियों के बावजूद भुवनचंद्र खंडूरी का एक सपना अधूरा रह गया।बीसी खंडूरी उत्तराखंड के इतिहास में पहले ऐसे नेता रहे, जिन्होंने 5 साल के भीतर दो बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। खंडूरी पहली बार साल 2007 में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। मार्च 2007 से लेकर जून 2009 तक उन्होंने प्रदेश की कमान संभाली। साल 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन, साल 2011 में एक बार फिर उन्हें उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया और सितंबर 2011 से मार्च 2012 तक वह इस पद पर रहे।खंडूरी का वो फैसला, जो दिल्ली तक गूंजाबतौर मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी का दूसरा कार्यकाल जिस ऐतिहासिक काम की वजह से यादगार बना, वह था एक नवंबर 2011 को पारित उत्तराखंड लोकायुक्त विधेयक। यह कानून उस समय देश के सबसे सशक्त और व्यापक लोकायुक्त कानूनों में गिना गया। उस दौरान दिल्ली में लोकपाल की लड़ाई लड़ रहे अन्ना हजारे ने भी बीसी खंडूरी के इस फैसले की खुलकर तारीफ की थी।
अन्ना हजारे ने उत्तराखंड सरकार के इस कदम को ऐतिहासिक बताते हुए केंद्र सरकार और अन्य राज्यों से भी उसी तर्ज पर सख्त भ्रष्टाचार-विरोधी कानून लागू करने की अपील की। उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बना, जिसने मुख्यमंत्री को लोकायुक्त के दायरे में लाने वाला सख्त विधेयक (उत्तराखंड लोकायुक्त अधिनियम) पारित किया था।2013 के बाद नहीं बना नया लोकायुक्त,साल 2012 में लोकायुक्त कानून का गठन होने पर सैयद रजा अब्बास राज्य के पहले लोकायुक्त बने। लेकिन, साल 2013 के बाद से कोई भी नया लोकायुक्त नियुक्त नहीं किया गया। राज्य सरकार की तरफ से एक सर्च कमेटी का गठन किया गया है, लेकिन नियुक्ति को लेकर प्रक्रिया अभी भी लंबित है। इसमें मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद और विधायकों को भी जांच के दायरे में लाने का प्रावधान था, जो भारतीय राजनीति में एक साहसिक और दुर्लभ कदम माना गया। इस विधेयक के बाद खंडूरी की अलग पहचान बन गई।
जब बीजेपी ने दिया नारा- खंडूरी है जरूरी
इसी दौरान साल 2012 में उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव हुए। बीजेपी ने खंडूरी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ा। पार्टी ने उस समय नारा दिया- ‘खंडूरी है जरुरी’। बीसी खंडूरी कोटद्वार विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन बीजेपी और खंडूरी दोनों को हार का सामना करना पड़ा। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में खंडूरी गढ़वाल सीट से जीतकर सांसद बने। हालांकि, बाद में बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली।
बेटी ऋतु और बेटा मनीष राजनीति में सक्रिय
हालांकि, अब बीसी खंडूरी की बेटी ऋतु खंडूरी और उनके बेटे मनीष खंडूरी उनकी सियासी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। ऋतु खंडूरी पहली बार 2017 में विधायक बनीं। 2022 में उन्होंने कोटद्वार सीट से चुनाव जीतकर अपनी पिता की हार का बदला भी लिया। फिलहाल ऋतु खंडूरी उत्तराखंड विधानसभा की अध्यक्ष हैं। वहीं, खंडूरी के बेटे मनीष ने कांग्रेस से अपनी राजनीति की शुरूआत की। 2019 के आम चुनाव से पहले उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और गढ़वाल सीट से चुनाव लड़ा। हालांकि वह चुनाव हार गए। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले वह बीजेपी में आ गए।
