उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो
उत्तराखंड के चारधाम में से एक बदरीनाथ धाम लाखों लोगों की आस्था का प्रतीक है। यहां हर साल देश-विदेश से भक्त पहुंचते हैं। जहां सनातन धर्म में पूजा और मांगलिक कार्य के दौरान शंख बजा कर देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है, लेकिन बदरीनाथ मंदिर में शंख नहीं बजाया जाता। मंदिर में शंख न बजाने के पीछे कई मान्यताएं भी हैं।पिछले दिनों यहां डीजे कॉन्सर्ट का आयोजन किया गया। जिसके बाद तीर्थपुरोहितों के साथ उत्तराखंड के लोगों में इस बात को लेकर रोष है। बताया गया कि उक्त कार्यक्रम सेना द्वारा आयोजित किया गया था। चमोली जिला प्रशासन की ओर सेना को नोटिस भी जारी कर दिया गया है। आइए जानते हैं बदरीनाथ में क्यों नहीं बजाया जाता है शंख?
क्या है डीजे कॉन्सर्ट विवाद?
सेना की ओर से हर साल की तरह इस बार भी बदरीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में ‘देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल-2026’ आयोजित किया गया था। जिसका विषय ‘संस्कृति हमारी विरासत, हमारा भविष्य’ था। लेकिन इस दौरान कॉन्सर्ट में डीजे पर जोर-जोर से गाने बजाए गए। यह भी कहा गया कि बदरीनाथ में आयोजित हुए इस कार्यक्रम में लिए कोई अनुमति नहीं ली गई।उत्तराखंड चार धाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने फेस्टिवल में नाच-गाने को लेकर सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि कुछ गायकों ने फूहड़ता का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम के स्वरूप पर नाराजगी जताई है। कहा कि धाम की धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं को ध्यान में रख कर कार्यक्रम किए जाने चाहिए। संगीत के माध्यम से शोर उत्पन्न करना धाम की धार्मिक गरिमा के अनुरूप नहीं है।वहीं बिना अनुमति सांस्कृतिक कार्यक्रम और तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल पर चमोली के जिलाधिकारी ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल शांतनु को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है।वरिष्ठ भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने भी जताई आपत्ति
भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने भी बदरीनाथ में आयोजित सांस्कृतिक महोत्सव को लेकर आपत्ति जताई। उन्होंने केंद्र और उत्तराखंड सरकार से ऐसे आयोजनों पर रोक लगाने का आग्रह किया।उन्होंने कहा कि धाम की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने शांतिपूर्ण भक्ति और ध्यान के लिए की थी। कहा कि हिमायली क्षेत्र में तेज गीत और बड़े आयोजनों के पर्यावरणीय प्रभावों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
क्या हैं मान्यताएं?
शास्त्रों के अनुसार, एक बार बदरीनाथ में बने तुलसी भवन में मां लक्ष्मी तपस्या कर रही थीं। उसी दौरान श्री हरि विष्णु ने शंखचूर्ण नामक राक्षस का वध किया था। पुरातन काल में शंख बजाकर जीत की घोषणा की जाती थी, मां लक्ष्मी की तपस्या में बाधा न पड़े इस कारण भगवान विष्णु ने शंख नहीं बजाया।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बदरीनाथ धाम में भगवान विष्णु साक्षात विराजमान हैं, इसलिए उनका आह्वान करने के लिए शंख बजाने की आवश्यकता नहीं होती है।
कुछ पौराणिक कथाओं में यह भी कहा जाता है कि अगस्त्य मुनि केदारनाथ में राक्षसों का वध कर रहे थे। तभी दो राक्षस अतापी और वतापी वहां से भाग गए। राक्षस अतापी ने मंदाकिनी नदी की मदद ली। वहीं राक्षस वतापी शंख के अंदर के छिप गया। इस वजह से बदरीनाथ में शंख नहीं बजाया जाता है।
