उत्तराखंड डेली न्यूज: ब्योरो
स्याल्दे (अल्मोड़ा)। बंद पड़े घरों पर लटके ताले और उजाड़ होते खेत। ये तस्वीर स्याल्दे विकासखंड की जसपुर ग्राम सभा की है। कभी रौनक और समृद्धि का प्रतीक रहा यह गांव धीरे-धीरे खाली होता जा रहा है। सूनी पड़ी बाखलियां अपनों की वापसी का इंतजार कर रही हैं।जसपुर ग्राम सभा में करीब एक दशक पहले तक 260 से अधिक परिवार रहते थे। अब यह संख्या घटकर लगभग 150 रह गई है। ग्राम सभा के दो तोकों जसपुर और कोलुखेत पर पलायन का असर साफ दिखाई देता है। जसपुर में 225 में से 150 परिवार शेष हैं जबकि कोलुखेत में 30 में से केवल 12 परिवार ही बचे हैं। पिछले दस वर्षों में कुल 93 परिवार गांव छोड़ चुके हैं।जसपुर को अपेक्षाकृत सम्पन्न गांव माना जाता है। यहां के करीब 30 परिवारों के 35 से 40 युवा विदेशों में कार्यरत हैं और उनके परिवार गांव में रहकर विकास कार्य करवाने और पलायन रोकने के प्रयास कर रहे हैं। ब्लॉक मुख्यालय क्षेत्र में होने के बावजूद जसपुर में इंटर कॉलेज, राजकीय महाविद्यालय, स्टेट बैंक और सहकारी संस्थान हैं लेकिन स्वास्थ्य, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं की स्थिति खराब है।पलायन का असर शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ा है। गांव का राजकीय प्राथमिक विद्यालय जहां कभी 30 से अधिक बच्चे पढ़ते थे, अब बंद हो चुका है।
खेती-बाड़ी चाैपट होने से बढ़ा पलायन
करीब 200 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस गांव में पहले खेती-बाड़ी ही आजीविका का मुख्य आधार थी। गेहूं, धान, मडुआ, मक्का, सोयाबीन और सरसों की अच्छी पैदावार होती थी। बंदरों, जंगली सुअरों और निराश्रित पशुओं के बढ़ते आतंक से खेती को भारी नुकसान पहुंचा। खेती चौपट होने पर लोग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर गए।पलायन का दर्द,पिछले 10 वर्षों में हालात पूरी तरह बदल गए हैं। अब नौकरीपेशा लोग अपने पूरे परिवार के साथ शहरों में बस गए हैं और गांवों में वही परिवार रह गए हैं जो बेरोजगार हैं या खेती पर निर्भर हैं। -जितेंद्र रजवार, क्षेत्र पंचायत सदस्य,पलायन के कारण गांव तेजी से खाली हो रहे हैं। पहले लोग खेती-बाड़ी और विभिन्न व्यवसायों से जुड़े थे। जंगली जानवरों और बंदरों के बढ़ते आतंक ने खेती को चौपट कर दिया जिससे लोग रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर चले गए। -केवला नंद जोशी, ग्रामीण,अब गांव पहले जैसे नहीं रहे। जहां कभी बच्चों की किलकारियां और बड़ों की हंसी-ठहाके गूंजते थे वहां अब सन्नाटा पसरा है। खाली बाखलियां पलायन की कहानी खुद बयां कर रही हैं। -बालम सिंह, ग्रामीण एक दशक में गांव की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। बचपन के साथी शहरों में बस चुके हैं और गांव में केवल मध्यम वर्गीय परिवार बचे हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने भी लोगों को पलायन के लिए मजबूर किया है। -चंद्र प्रकाश पंचोली, ग्रामीण
